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शनिवार, 8 जुलाई 2017

अधूरी

कई जन्मों से अधूरी हूँ
धड़कनों को लिए धूमती हूँ
तेरी तलाश में लोक परलोक घूमती हूँ


जानती हूँ इतना आसान नहीं है तेरा मिलना
इसलिए कई जन्मों को लिए घूमती हूँ


मेरी साँसों में है तेरी साँसों की महक
तेरी महक लिए जंगल जंगल घूमती हूँ


तू मुझ में समाया हुआ है
इस बात से अनजान
मै तेरे लिए दर दर घूमती हूँ


तू हवा में घुला है
मै तुझे जर्रे जर्रे में ढूँढती हूँ।



- Geetanjali Girwal



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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

मैं



मैं उसकी चाहत हूँ जिस पर दुनिया मरती है।

मैं उसकी हसरत हूँ जिसकी चाहत दुनियां रखती है।

मैं उसकी आँखों में बस्ती हूँ जिस पर से लोगों की नजर नही हटती है।
मैं उसकी हकीकत हूँ जो औरों का ख्वाब है।
मैं उसका गुरूर हूँ जिसे पाने का औरों को जुनून है।
मैं उसका दिल हूँ जो औरों की धड़कनों के बढ़ने का कसूर है।

मैं उसका अहसास हूँ जिस पर लोगों के डगमगाते ख्यालात है।
मैं उसका ईमान हूँ जिस पर अच्छे-अच्छो के इरादे बेईमान है।
मैं उसकी आस हूँ जो औरों की न मिटने वाली प्यास है।

मैं उसकी तमन्ना हूँ जो औरों की दिली खवाइश है।
मैं उसकी सादगी हूँ जो औरों के लिए ख़ूबसूरती की आजमाइश है।
मैं उसकी नजाकत हूँ जो गर रखे कदम साथ तो औरों की हौसला हाफ्जाई है।
मैं उसकी शरारत हूँ जो औरों की आह निकाल देने वाली हिमाकत है।
मैं उसका अरमान हूँ जिसकी हसरतो के जाम लोग पिया करते है।
मैं उसकी याद हूँ जिसकी याद में लोग जिंदगी गुजार दिया करते है।

और तो और मैं उसका जज्बात हूँ जिस पर लोग बहक जाया करते है।....................
...............................सच कहूँ  वैसे तो मैं कुछ भी नहीं ..................................पर मैं उसकी,पर मैं उसकी ,पर मैं उसकी रूह की वो छुअन हूँ जो मुझे उससे छिनने पर हर उस शख्श को झकजोर जाया करती है।



Written By Ritika {Preeti} Samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being....✍


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सोमवार, 3 जुलाई 2017

पापा



बाहर से है सख्त दिल मे बहोत नरमी है

कंधो पे चढके जिनके जिंदगी शुरू की है

वो ऊचाई जिंदगी मे ना दोबारा मिलती है

वो पापा ही तो है जिनमे मेरी जान बसती है। 
सब गलतिया हमारी कभी वो छिपाते नही है
छिपा कर के अपना प्यार जमकर बरस जाते है
वो शख्स जिसकी डांट सबसे ज्यादा असर करती है

वो पापा ही तो है जिनमे मेरी जान बसती है। 


जिंदगी मे उनकी कोई अपनी ख्वाहिश ना होती है

हमसे ही शुरू होकर खत्म हम पर हो जाती है

हमारी ही हंसी मे जिसको अपने गम की दवा मिलती है

वो पापा ही तो है जिनमे मेरी जान बसती है। 

जो लिखे ना गये कही नियमो मे जिंदगी बंधी है
थक कर रूकना तो उनकी फितरत मे ही नही है
चेहरे पर शिकन उनके फिर भी नही दिखती है
वो पापा ही तो है जिनमे मेरी जान बसती है



- Anupama verma

                                

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बुधवार, 28 जून 2017

लायक

जरा हटके - नई कविता
लायक
--------
कभी संतोष तो कभी दर्द
झलकता है
बूढ़े हो चले माँ - पिता की आँखों में ,
जिसे दबाने का
करते हैं वे भरसक प्रयत्न
थोथी मुस्कुराहट के तले ।

सालता है उन्हें ,
कभी कभी बच्चों को
लायक बना देने का दंश।

इसी लायकी के चलते
दूर बस गए हैं बच्चे उनसे
मत भिन्नता और
कमाने की चाह में।

उभरता है संतोष भी कभी कभी
कि बना दिया उन्होंने
अपने बच्चों को इतना लायक
करने लगे हैं वे अब तर्क - वितर्क
खड़े होकर पैरों पर अपने।

इसी दर्द और संतोष का लेकर सहारा
देते रहते हैं सांत्वना
बूढ़े दम्पति इक - दूजे को
चलाने के लिए अपनी रंगहीन बेढब जिंदगी।

मानते भी हैं वे , कि -
जरूरी है दुनिया में लायक होना।

पर चाहते हैं यह भी कि -
छूटे न संस्कार , रूठे न बच्चे
दूर होकर भी हों इतने पास, कि -
मंद होती धड़कनों की
सुन सकें आवाज।
कभी भी ..कहीँ भी ।

सही भी है यह सोचना उनका ।
रखना होगा हर बच्चे को
बूढ़े माता पिता का ध्यान
बनने के लिए नजरों में उनकी
सही अर्थों में " लायक " ।

कोशिश करेंगे न हम -
दुनिया की नहीं ,
उनकी नजरों में
बनने की - लायक !
      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।



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खुदा की हंसती मूरत - माँ


माँ चन्द्रमा सी शीतलता लिए हुए है
वो सूरज सा उसका तेज भी मेरे  लिए है
मेरे ख्वाबो के लिए तारा बन टूटती है
खुदा की हंसती मूरत मेरे लिए तू ही है। 


माँ फूल जितनी कोमलता लिए हुए है

वो पहाड जितनी सख्त भी मेरे लिए है

मेरी हर गलती पर खुद को ही दोषी मानती है

खुदा की हंसती मूरत मेरे लिए तू ही है। 
माँ धरती पर चाँद की चाँदनी लिए हुए है
वो आसमान सा बडा आंचल भी मेरे लिए है
मेरी चोट पर आंसू संग मरहम लगाती है
खुदा की हंसती मूरत मेरे लिए तू ही है। 


माँ सूखे मे बारिश की तरह जिंदगी बांटती है

वो मुझपे आने वाले हर तूफान को रोकती है

मेरे बिन बोले जो हर बात समझती है

खुदा की हंसती मूरत मेरे लिए तू ही है। 


- Anupama Verma

                               

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मंगलवार, 27 जून 2017

वह स्वाद



जरा हटके - नई कविता
वह स्वाद
----------
अब भी रक्खा है ,
जिव्हा पर वह स्वाद ,
जो था माँ और दादी - नानी के
हाथों में ।
कितने जतन और प्यार से
घट्टी में अपने हाथों से पीसकर गेहूं
बनाती थी आटा
गाते हुए कोई लोकगीत।
पिसता था सिलबट्टे पर अलसुबह
महकता मसाला और
फिर बनता था वह सुस्वादु भोजन
जो अब भी, भुलाये नहीं भूलता है।
याद है मुझे , जब
मिलकर अडोसन - पड़ोसन
बैठ जाती थीं दुपहरिया में
जाकर किसी के भी घर ,
और बन जाते थे ,बातों ही बातों में
सिवइयां, बड़ी पापड़ ,आचार।
अब भी याद है मुझे
इनका प्रेम भरा वह स्वाद
जिसमें छिपा होता था
हंसने -हँसाने , सीखने - सिखाने
और मिल - बाँट कर खाने का
कुदरती एहसास ।
पर अब निगल लिया है इसे
स्वारथ और आपाधापी की
अंधी होड़ ने ,
होकर बाजारबाद से ग्रसित।
इसीलिये नहीं देता 
उस जमाने की 
कोई और बानगी , क्योंकि अब
बदल गया है समय और 
बदल गए हैं हम ।
पर , फिर भी कोशिश तो करें
देने की अगली पीढ़ी को
जीवन के वे विविध स्थाई स्वाद
जो अंकित हैं मन मस्तिष्क में
अब भी हमारे। 

    - देवेंन्द्र सोनी, इटारसी।

                               

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....मैं फिर अकेला रह गया....

 
जिंदगी की राह में यादों का मेला रह गया
कल भी था अकेला, मैं आज फिर अकेला रह गया। 

अपनी अहमियत कुछ लोगो को बतलाने में रह गया
कुछ नए चहरों को लुभाने मैं रह गया...

कल जाने क्या-क्या मैं अपने दोस्तो से कह गया
मेरे गम का बादल भी यूँ मुझमे सिमट कर रह गया..

जिंदगी की राह में यादो का मेला रह गया
कल भी था अकेला, मैं आज फिर अकेला रह गया

मन मेरा था जो समंदर की लहरों सा तैरता 
वो अब वीराना रेगिस्तान बन कर रह गया...

एक तख्त था जिसपर मैं बैठकर इस जहान को देखता
अब तो बस उस तख्त का गुलाम बन कर रह गया...

कहा था किसी अपने से क्या साथ देगा तू मेरा
वो हमसफ़र भी मुझसे अलविदा कह गया...

जिंदगी की राह में यादो का मेला रह गया
कल भी था अकेला, मैं आज फिर अकेला रह गया
.. मैं फिर अकेला रह गया...

                   संतोष कुमार
(प्रजापति) 
Read More by संतोष कुमार:तेरे पास भी तो है , हवा... एक सीख..
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कुछ अलग ही है बात तेरी

सुबह  तेरी, रात तेरी 
और दिन भर बात तेरी 
चाहता तो हु यादो को भी
पर कुछ अलग ही है बात तेरी... 
चाहत यही  दिन रात मेरी 
मिलने की बने तुमसे बात मेरी
कुछ ऐसे मिल जाए हम
मैं तेरा सावन,  तू बरसात मेरी 
कुछ अलग ही है बात तेरी... 
जब मिलते है तो होठ सिले
कुछ भी न हो पाए बात मेरी
बस यूँही आँखों से आँखे  मिले 
क्या इससे भली थी याद तेरी 
 कुछ अलग ही है बात तेरी ...

- Satish Sikhwal 


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रविवार, 25 जून 2017

दो कदम

दो कदम तुम चलो
दो कदम हम चले
शिकवे दूर हो ना हो
आओ फिर से हम मीले गले। 

कोई नही है सम्पूर्ण जग में
इस बात को दिल मे धरे
भूल कर एक दूजे के दोष
आओ फिर से हम मीले गले। 

कुछ मैं , कुछ तुम अपनी कहो
किसी बात पे रूठे किसी पे लडे
पर प्यार के क्षितिज पे खड़े हो
आओ फिर से हम मीले गले। 

जरूरी है उल्फत में झगड़े भी
रूठना मनाना औऱ लफड़े भी
चलो भूल सब  प्यार बढ़ाये
आओ फिर से हम गले मिल जाये। 

ऐसा है अब नखरे ना  दिखा
मुँह को इस तरह न बना
सब भूल आया पास तेरे
बांहे फैला और गले लगा
आ, आओ ना, मेरे क़रीब आ। 

।।प्रदीप सुमनाक्षर।।

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वो

सितारों में वो आफताब सी है
सच उसकी मुहब्बत लाजवाब सी है

गुलों में वो गुलाब सी है
सच उसकी अदायें बेमिसाल सी है

ऋतुओं में वो बहार सी है
सच उसमें कारीगरी कमाल सी है

वफाओ में वो बेहिसाब सी है
सच मुझे वो नमाज सी है

।। प्रदीप सुमनाक्षर।।


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शनिवार, 24 जून 2017

कैसे कह दूँ


कैसे कह दूँ गुस्ताख तेरे गुनाह ही है,
जबकि.......

मेरी बर्बादी की वजह तू ही नहीं तेरी यादें भी है।



Written By Ritika{Preeti} Samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being....✍


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भोर

जरा हटके - नई कविता

टूटता नही है कोई नियम
प्रकृति का
होती है रोज ही भोर
हटाकर पसरे रजनी के तिमिर को।
छुपे हैं इसमें संदेश कई -

जीवन चक्र के भी ।
भोर दिलाती है भरोषा -
नही है अंधकार स्थाई।

आए जब भी जीवन में
निराशा , घुटन या अवसाद के पल
डगमगाए आत्मविश्वास हमारा
तब कहती है भोर , यही -
चैन से सोते हो न ,
लेकर रजनी का आनन्द !
और आ जाती हूँ पल में ही - मैं ( भोर )
मिटा देती हूँ अंधकार ,
बिखेर कर चहुं ओर उजास ।
इसी तरह लो आंनद ,रखो धैर्य , 

छाए जब जीवन में
अनकहे / अनचाहे अंधकार ।

हट जायेंगे वे भी ,
पूरा होते ही समय
रजनी की मानिंद
और हो जाएगा उजास
नई भोर का ।
अनवरत है यह क्रम 

बदल सकता नहीं , कोई इसे
आएगी ही जीवन में 
रजनी भी और भोर भी।
समझें इसे हम 
अपने अपने सन्दर्भों में ।

                      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी


Read More by देवेंन्द्र सोनी: नई कविता  , पिता का संदेश  ,फादर्स डे पर,  बचपन के वो पल सुहाने , आईना  , किसान , वर्षा की फुहार                                           

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हवा... एक सीख...



मैं तन्हा बैठा था बाग मैं...की ये पूर्वाई चली आई मेरी ओर...

और फिर ये हुआ...

छू कर मेरे गाल को ये हवा कुछ कह गई...
फिर चली जाने कहाँ मुझको यूँ तन्हा छोड कर....
मैंने पूछा रुक तो जा, बैठ मेरे पास तू...
जाना कहीं नही तुझे, फिर ये चंचलपन कैसा तुझमें है |
तू रुकती क्यूँ नही,पलभर ठहरती क्यूँ नही...
मैं तो ये भी हू जनता की, ये वतन तेरा नही...

फिर रुक कर पास आई वो मेरे...
ओर  कहने लगी..

ये बात तो बता, मैं ठहरी तो तुझे क्या मिल जाएगा...
हर शक्स जो जिंदा है .. तड़प कर मर जाएगा...
क्यूँ चाहता है तू की मैं ठहर जाउँ यहीं, 
इस खोफ़नाक जुर्म का जिम्मा तेरे सर पर आएगा...
ए शायर इतना समझ ... तू भी नही जी पाएगा...
फिर क्या तू स्वर्ग की अप्सराओं से बतीयाएगा...
स्वर्ग क्या है ,तुझे नर्क भी मिल ना पाएगा...


मैं नही था जनता, माफ़ करना तू मुझे ...
अपनी नज़रो मैं अब ओर गिरा ना  मुझे...

पर, इस हक़ीकत से तू भी कहाँ अंजान है, मैं भी कहाँ अंजान हूँ..
सच कहती है मा मेरी, की मैं अभी नादान हूँ..
इस जिंदगी की जंग से, मैं थोडा परेशन हूँ...
माफ़ करदे तू मुझे
...क्यूंकी हवा के मुक़द्दर मैं ही नहीं है ठहरना...

.... चलो चलता हूँ... घर वापस... ग़लत पंगे लेलिए |

नमस्ते...
                                                                                                                    - संतोष कुमार प्रजापति


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शुक्रवार, 23 जून 2017

वर्षा की फुहार


जरा हटके - नई कविता
वर्षा की फुहार ।

देह झुलसाती तपन
के बाद जब
पड़ती हैं वर्षा की
रिमझिम फुहारें ।

खिल जाता है रोम -रोम
और
नाच उठता है , मन - मयूर ।

इस नैसर्गिक सत्य को
यदि जीवन से जोड़कर देखें,
तो पाते हैं
कठिनाईयाँ और संघर्ष की तपन से
झुलसने के बाद ही होती है
सुख - सुविधाओं की बौछार भी
जीवन में हमारे।

मिलता है जिससे वही सुकून
जो देती है तपन के बाद वर्षा ।

बस इतना ही समझ लें हम -

जरूरी है जिस तरह सभी मौसम
प्रकृति को संवारने के लिए।
उसी तरह जरूरी है सुख - दुःख
और संघर्ष का भी होना ,
जीवन को संवारने के लिए। 

            - देवेन्द्र सोनी, इटारसी।


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बुधवार, 21 जून 2017

अजीब-ओ-गरीब मेरे सपने थे

अजीब-ओ-गरीब मेरे सपने थे
तुम्हें गले लगाकर रोने के सपने थे
तुमसे बातें करने के सपने थे
तुम्हारे हाँथ को हाँथ में लेकर मीलों दूर साथ चलने के सपने थे। 


तुम्हें जी भर कर निहारने के सपने थे
तुम्हारे कंधे पे सिर रखकर सुकून से झपकी लेने के सपने थे
तुम्हें पागलों सा प्यार करने के सपने थे
तुम्हें तुम कितने दिल के करीब हो जताने के सपने थे। 


तुम्हें रूह की रूह में समाने के सपने थे
तुम्हारे लिये बेहद दर्द सहने के सपने थे 
तुम्हारी आँखों में खुद को पाने के सपने थे
तुम्हें सिर पे बिठाने के सपने थे। 


तुम्हारे बिन रूठे तुम्हें मनाने के सपने थे
तुम्हारे आगे पीछे घूमती रहूँ,तुम्हारी एक बोली पर हाजिर हो जाने के सपने थे
तुम्हारी मुस्कुराहट के लिये दिन रात एक  करने के सपने थे
तुम्हारी बातों को पत्थर की लकीर बना देने के सपने थे। 


तुम्हें दिल,रूह,सांस इस आत्मा का ही नहीं  इस जहां के शंहशाह के रूप में देखने के सपने थे
तुम्हारे दिए दर्द को तुम्हारे सीने से लिपटकर हल्का करने के सपने थे
तुम पर जी,जवानी,जान कुर्वान करने के सपने थे
तुम्हें बनाकर खुद को मिटा देने के सपने थे। 


तुम ही चारों धाम,तुम ही ईश्वर तुम ही परमेश्वर के समान बस तुम्हारी पूजा करने के सपने थे
तुम्हारे लिये एक नहीं आने वाले हजारों जन्म में इन्हीं सपनों को पूरे करने के सपने थे
बस यही कुछ सपने थे
शायद बहुत महंगे मेरे सपने थे ।


Written By Ritika {Preeti} samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being.....✍



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गिला

गिला किस से करूँ समझ नहीं आता,
तुमसे या अपनी महोब्बत से......
दिल किसी एक को चुन ही नहीं पाता।

Written By Ritika {Preeti} Samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being....✍


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वृद्ध आश्रम....




दिल की बात... वृद्ध आश्रम....

अभी एक दिन पहले ही मेरे एक जानकार मुझे एक वृद्ध आश्रम ले गये, वहां बहुत ही बूढ़े इंसान थे, जो बड़े-बड़े घरों से तालुक रखते थे, उन सभी से मिला मैं, दिल अंदर ही अंदर से रो रहा था तब, जब उनकी बातें सुन रहा था, कोई डॉक्टर था तो कोई टीचर तो कोई किसी इंडस्ट्री का मालिक था, जो इस वृद्ध आश्रम में रह रहे हैं। 
कैसी है ज़िन्दगी यारों, बच्चे अपने मां-बाप को भुलाकर उन्हें  वृद्ध आश्रम में छोड़ जाते हैं, उन्हें घर से निकाल देते हैं, शर्म आनी चाहिए उन सब बच्चों को। ...... 

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मंगलवार, 20 जून 2017

आईना



जरा हटके - नई कविता
            आईना
             
सच ही है यह
झूठ
नही बोलता है
आईना
पर , न जाने क्यूं
जब भी
खड़ा होता हूँ मैं
आईने के सामने
दिखता है मुझे
मेरे अंदर का कलुष !


बताता है वह मुझे
जाने-अनजाने किए
मेरे वे अपराध
जिन्हें मै कभी
स्वीकारना नही चाहता
पर
आईना होता ही है
इसीलिए कि
बताए वह भी जो
स्वीकारना नही चाहते
कभी हम ।


आईना दिखाता है
हमारे
अंतःकरण की
हर रग को ।


पहचानता है वह
अच्छे से इन्हें
पर हम वही
देखना चाहते हैं
जो हमको भाता है ।

फिर कहता हूँ -
आईने में दिखती तस्वीर
झूठी नही होती
झूठा होता है
हमारे देखने का नजरिया
क्योंकि हमको
वही अच्छा लगता है
जो करे हमें मुग्ध
जो करे
हमारी प्रसंशा ।


      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।


More: नई कवितापिता का संदेशफादर्स डे पर, बचपन के वो पल सुहानेकिसानवर्षा की फुहार
     

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