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शुक्रवार, 15 मई 2020

कुछ मुक्त कविताएं : भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"

साहित्य सारथी
मुझसे थोड़ा दूर ही रहो तो अच्छा है बदनसीब हूं पास न आओ तो अच्छा है। ब
ड़ी बड़ी बातों से डर लगता है मुझे झूठी बातें न सुनाओ तो सबसे अच्छा है। सूंघना अच्छा है सुगंध से डर लगता है माला पुष्प का न हो तो बहुत अच्छा है। फूल तोड़ना मुझे अच्छा नहीं लगता है सूख कर फूलों का मुरझाना अच्छा है। बचपन में अपने पिता जी से सीखा था कि पेड़ों में भी जीवन जीने की लालसा होती है। बड़ी उमस है हरे भरे पेड़ पौधे सूख जाते हैं पेड़ों को पानी पिलाना इन सबसे अच्छा है। शब्द बहुत अच्छे होते हैं ये पहली बार सुना उसने शब्दों की बेइज्जती करते बुरा लिखा। सुनी सुनाई बातों में कितनी सच्चाई होती है कान दिया तो ये मालूम हुआ शब्द बुरे नहीं। हालांकि उसने कोई गुनाह नहीं किया लेकिन बस इतना कहा मार ही डालूंगा कुछ बोले तो। बात का बतंगड़ बनाते एक अरसा बीत गया गूंगी ने बड़ी मासूमियत से उसे कुछ न कहा। © भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"

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बुधवार, 13 मई 2020

लेखक ?



बहुत ही कठिन होता है जवाब देना जब कोई पूछता है की आप लेखक क्यूँ हैं या लिखना क्यों पसंद करते हैं। जवाब देना और अधिक कठिन हो जाता है जब मैं खुद से पूछता हूं की 

“मैं लेखक क्यूं हूं ?”

“यह मेरी इच्छा है या विकल्प ?”


फिर मैं खुद से पूछता हूं की एक लेखक के पास क्या होता है ?


  • कलम और विचारों की स्वतंत्रता।


यही विचारों की सवतंत्रता ही किसी भी लेखक को विशिष्ट बनाती है। लेखक अपने आप में विशिष्ट होता है क्यूंकि वह एक कलाकार है, शब्दों को पिरोकर एक मोतियों की माला तैयार करता है।

वह सिर्फ शब्दों का कलाकार ही नहीं वह सच बोलने का साहस भी रखता है, समाज का आईना बनकर समाज का मार्गदर्शक भी करता है। लेखक को सिर्फ शब्दों का सौदागर नहीं कहा सकता। 


मुंशी प्रेमचंद जी के अनुसार “लेखक समाज की हाँ में हाँ मिलाने मिलाने वाला निष्क्रिय पदार्थ नहीं होता, उसका अपना व्यक्तित्व होता है और वह अपने विशिष्ट दृष्टिकोण से समाजिक समस्याओं पर विचार करता है। “


इसलिए लेखक को सिर्फ लेखन तक ही सीमित नहीं माना जा सकता; वह इससे कहीं ज्यादा होता है, लेखन उसके लिए एक माध्यम है और यह माध्यम समुद्र की तरह इतना विशाल है की इसका किनारा भी दिखाई नहीं पड़ता। इसी समुद्र में कलम रूपी नाव लेकर निकले नाविक को ही लेखक कहा जा सकता है।


मेरे लिए :

“लेखन एक ऐसी कला है जहां मैं खुद को चुनौती दे सकता हूं, हर बार मैं कुछ नया कर सकता हूं।” - सारथी 


नित नए सपने और हद से आगे जाने का जुनून  …लेखन ही है जो ये सब करने की आजादी देता है।

  • जहां मैं पल भर में आसमान से परे जा कर खुद को महसूस कर सकता हूं।

  • जहां मेरे सोचने, समझने और लिखने पर कोई पाबन्दी नहीं है।

  • जहां मैं हर बार कुछ नया कर सकता हूं।


लेखक होना अपने आप में सम्पूर्ण होना (लेखक के लिए ) है जहां उसके ख्वाबों की दुनिया आँखों के सामने होती है। यह सबके लिए अलग - अलग हो सकता है, मगर , दुनिया सामने वह एक विशिष्ट व्यक्ति ही होता है। आपका विकल्प आपको एक सम्पूर्ण एहसास नहीं दे सकता, आपकी इच्छा या वैकल्पिक इच्छा ही आपके सम्पूर्ण एहसास का कारण हो सकती है। 

एक लेखक की दिनचर्या के कुछ हिस्से मैं आपके सामने रखता हूँ जिन्हें सर्व सहमति से स्वीकारा जाता है। 

  • एक लेखक उन क्षणों में भी सोचता है जब वह अपने आपको व्यस्त महसूस करता है।  

  • हर बातचीत, हर दृश्य, हर अहसास उसके दिमाग को सोचने के लिए कच्चा माल है। 

  • एक लेखक अपने आप को नितांत अकेला महसूस करता है, ऐसा करके ही वह विचारों को कलमबद्ध कर पाता है। 

  • लेखक अक्सर खुद से बातें करते हैं। विशिष्ट लोगों में ऐसे गुण देखे जाते हैं। 


नोट: यह लेख सिर्फ लेखकों को जानने और प्रेरित करने के लिए लिखा गया है, जो मेरे व्यक्तिगत विचार हैं इसलिए वैचारिक सहमति जरूरी नहीं है। आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा। 


- सारथी 

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शनिवार, 9 जून 2018

'बेबस बेटी'



जाती है दुल्हन थापे घृत के मायके में लगाये,ससुराल की दहलीज लांगती है ससुरालीजनों से 
अपनों सी आश लगाये,
होता है जब उसी जगह दुर्व्यवहार उस से तो मायके की प्रीत रह-रह के रुलाये,

पौंछती है नीर सोच के शायद मिले कभी प्यार उनसे जिनसे मैंने ह्रदय के है धीर लगाये,
आज नहीं तो कल हो जायेंगे ये मेरे अपने, हे ! ईश, दिन जल्दी से वो आये,

लाऊँगी मैं अनुराग सभी में इतना कि कोप,कपट गैर की भावना ऐसे जाए 
कि भूले से भी फिर आने की सोच न लाये,

धर्म मेरा,कर्तव्य मेरा, विनोद में सबको जोडूं,ननद-देबर की दूजी माँ, भाभी माँ मैं 
और सास-ससुर मात-पिता से मेरे,
ससुराल का घर मेरा ये प्रेम में हो ऐसे सराबोर कि
 साक्षात कान्हा जी का ये मंदिर बन जाये,

मैं न शब्द कोई मुँह से निकालूंगी चाहे कितने भी घात तन को छलनी कर जाये,
सहूँगी मैं तब तक जब तक प्राण न निकल जाये 
क्यूँकि माँ-पापा ने सिखाया था मुझे कि बेटी, मायके से डोली में विदा हुई 
तू ससुराल से विदाई एक ही बार हो कि अर्थी में तू जाये
 लेकिन कभी न तू ऐसा कुछ करना कि मायके की लाज जाये,

हाँथ जोड़ मैं विनती हूँ करती आपसे(ससुरालीजन) मैं पूरी करूँगी आपकी हर माँग 
अपनी देह को दांव पर लगाये.... पर,
 दहेज की खातिर मुझे जलाकर मेरे मात-पिता को जीते जी ना मारिये,
आपको दहेज देने को मेरी माँ ने अपने जेवर गिरवीं थे 
तब रखवाये और आज भी पूरी कर रहे है माँग आपकी मेरे तात जो अब अपने घर-द्वार चुके हैं लुटाये,

मैं बेटी हूँ किसी लाचार माँ और असहाय बाप की तो आपके घर में भी है एक बेटी 
देख उसका मुख मेरे प्रति भी अपनी भावनाओं को क्यूँ न आप जगाये...?

निर्बल हो चुकी हूँ मैं आज तो और भी ज्यादा 
जिस सुयोग्य वर को ढूंढने में मेरे पिता के पैरों ने काटें खाये 
आज उसी ने मेरी रक्षा में न हाँथ उठाये,

थक-हार चुकी हूँ मैं, अब यातनाओं और याचनाओं से नहीं रुकती है
 गर अब आपकी प्रताड़ना तो बेशक मेरे खात्मे को अब लो कदम उठाये
 मगर अब मैं और नहीं करने दूँगी पिता को अपने दहेज की भरपाई...
लगा दो आग मुझे,मेरे बाद फिर और किसी की बेटी को,
जारी रख इस घटनाक्रम को यूँ कर देना जड़ से खत्म हमें, 
ताकि फिर कोई और ना इस धरा पर बेटी आये,

मात-पिता की चिंता 'एक बेटी' की वजह से उनकी चिता बन जाये 
ऐसी बेटी से तो अच्छा है दुनिया की हर बेटी मर जाये......
अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये।

After a long time, I publish here my poetry...Plz must read...🙏
Ritika(preeti{preet}samadhiya.....
Please Try To Be A Good Human Being...✍

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