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शनिवार, 9 जून 2018

'बेबस बेटी'



जाती है दुल्हन थापे घृत के मायके में लगाये,ससुराल की दहलीज लांगती है ससुरालीजनों से 
अपनों सी आश लगाये,
होता है जब उसी जगह दुर्व्यवहार उस से तो मायके की प्रीत रह-रह के रुलाये,

पौंछती है नीर सोच के शायद मिले कभी प्यार उनसे जिनसे मैंने ह्रदय के है धीर लगाये,
आज नहीं तो कल हो जायेंगे ये मेरे अपने, हे ! ईश, दिन जल्दी से वो आये,

लाऊँगी मैं अनुराग सभी में इतना कि कोप,कपट गैर की भावना ऐसे जाए 
कि भूले से भी फिर आने की सोच न लाये,

धर्म मेरा,कर्तव्य मेरा, विनोद में सबको जोडूं,ननद-देबर की दूजी माँ, भाभी माँ मैं 
और सास-ससुर मात-पिता से मेरे,
ससुराल का घर मेरा ये प्रेम में हो ऐसे सराबोर कि
 साक्षात कान्हा जी का ये मंदिर बन जाये,

मैं न शब्द कोई मुँह से निकालूंगी चाहे कितने भी घात तन को छलनी कर जाये,
सहूँगी मैं तब तक जब तक प्राण न निकल जाये 
क्यूँकि माँ-पापा ने सिखाया था मुझे कि बेटी, मायके से डोली में विदा हुई 
तू ससुराल से विदाई एक ही बार हो कि अर्थी में तू जाये
 लेकिन कभी न तू ऐसा कुछ करना कि मायके की लाज जाये,

हाँथ जोड़ मैं विनती हूँ करती आपसे(ससुरालीजन) मैं पूरी करूँगी आपकी हर माँग 
अपनी देह को दांव पर लगाये.... पर,
 दहेज की खातिर मुझे जलाकर मेरे मात-पिता को जीते जी ना मारिये,
आपको दहेज देने को मेरी माँ ने अपने जेवर गिरवीं थे 
तब रखवाये और आज भी पूरी कर रहे है माँग आपकी मेरे तात जो अब अपने घर-द्वार चुके हैं लुटाये,

मैं बेटी हूँ किसी लाचार माँ और असहाय बाप की तो आपके घर में भी है एक बेटी 
देख उसका मुख मेरे प्रति भी अपनी भावनाओं को क्यूँ न आप जगाये...?

निर्बल हो चुकी हूँ मैं आज तो और भी ज्यादा 
जिस सुयोग्य वर को ढूंढने में मेरे पिता के पैरों ने काटें खाये 
आज उसी ने मेरी रक्षा में न हाँथ उठाये,

थक-हार चुकी हूँ मैं, अब यातनाओं और याचनाओं से नहीं रुकती है
 गर अब आपकी प्रताड़ना तो बेशक मेरे खात्मे को अब लो कदम उठाये
 मगर अब मैं और नहीं करने दूँगी पिता को अपने दहेज की भरपाई...
लगा दो आग मुझे,मेरे बाद फिर और किसी की बेटी को,
जारी रख इस घटनाक्रम को यूँ कर देना जड़ से खत्म हमें, 
ताकि फिर कोई और ना इस धरा पर बेटी आये,

मात-पिता की चिंता 'एक बेटी' की वजह से उनकी चिता बन जाये 
ऐसी बेटी से तो अच्छा है दुनिया की हर बेटी मर जाये......
अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये।

After a long time, I publish here my poetry...Plz must read...🙏
Ritika(preeti{preet}samadhiya.....
Please Try To Be A Good Human Being...✍

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मंगलवार, 14 नवंबर 2017

अजीब तेरा-मेरा इश्क


अजीब है ना तेरा इश्क
मुझे तेरी आँखों में दिखता नहीं
और तेरी जुवां पे टिकता भी नहीं
तुझसे वफ़ा करते बनता भी नहीं
और बेवफाई का पड़ा पर्दा हटता भी नहीं
गिरगिट जैसा रंग तेरा एक रंग में तू ढलता नहीं
बातें है चाशनी से तर बिन मक्खन के जिन पे काम चलता नहीं
इन सब के वाबजूद भी तू मेरी नजरों से गिरता नहीं
और अपनी उस पुरानी छवि से ऊंचा उठता भी नहीं
अजीब है ना मेरा भी तुझसे इश्क
जो
चीखों पर भी राहत गहन करता नहीं
चोट पर भी अगले कदम को सम्भलता नहीं
चाहने के गुनाह से हरगिज बचता नहीं
ना चाहने का गुनाह भूलकर भी  करता नहीं।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

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शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

ये दिल ❤


ना तुमने कभी मुझे समझा
ना तुमने कभी मुझे जाना
ये दिल फिर भी तुम पे मरता हैं
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता है

रहोगे कब तलक जाली सलामों  में
चलोगे कब तलक झूठी शानों में
खो  जाएगी एक न एक दिन सोच तुम्हारी मेरी चाहत के महखाने में

फरक तुम पर नहीं पड़ता तुम हो कुछ ऐसे गुमानो में
राह थामी तुमने जिसका मंजिल से ना वास्ता ना ही पता ठिकानों में
आओगे थक कर तुम एक न एक दिन मेरे ही आशियाने में

ना तुमने कभी मुझे समझा
ना तुमने कभी मुझे जाना 
ये दिल फिर भी तुमपे मरता है
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता हैं

वस्ल की राते गुजरती तुम्हारी हर हसीना के नजराने में
बहकते हो तुम दिन में भी जिस्म की खुशबू के तराने में
रोओगे जरूर एक न एक दिन तुम मेरी याद के बीते जमाने में

कर-कर अपनी मनमानी मजाक बनाते मेरा तुम अपने यारों के गुठ को और रंगीन बनाने में
भरता ना दिल तुम्हारा तो जिद्द कर जाते मुझसे ही मेरी हालत बयाँ करवाने में
देख लेना वादा है तुमसे ये मेरा तरस जाओगे तुम एक दिन और बिखर भी जाओगे तुम उसी दिन फिर से मुझ जैसी महबूबा पाने में।

न तुमने कभी समझा
न तुमने कभी जाना
ये दिल फिर भी तुमपे मरता है
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता है।

Written By  Ritika {Preeti} Samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being...✍

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शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

तू और तेरा किस्सा ही खत्म



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अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी

अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी 
और उसके साथ हमारा पागलपन
तुम जिद किये जाते हो हर बात की 

और हम कुबूल किये जाते है मान उसे हुकुम

कब तक चलेगा ये सिलसिला यूँ ही?

ना तुम जानो हो ना हम
बस चले जा रहे हो तुम अपने जोश में 

और परछाईं जैसे  कदम रखे जा रहे है सँग हम

खुश तुम हो अपनी मर्जियों की पूर्ति पर 

और बेहद खुश है तुम्हारी खुशी में हम
और क्या चाहिये इस जिंदगी से 

कभी-कभी सवाल ये ना करने को करता है मेरा मन

जब तुम मिले चाहने को तो अब 

और कोई ख्वाईश क्यूँ करें इस जीवन से हम
बेशक तुम्हारी जिद्द हूँ मैं पर क्यूँ ना 

हर जन्म तुम पर वार दे ऐसी मुहहोवत करें तुमसे हम।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

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रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो

रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो
मरहम लगाने आते हो या जख्म हरे कर जाते हो
रुकने के लिए नहीं....हो नहीं अब साथ मेरे ये बताने आते हो


ना जाने क्या तुम्हारे मन में समायी हैं 

क्या लेने बार-बार तुम चले आते हों

मुस्कुराने को कहते हो,रुलाने का मौका छोड़ते नहीं
बस तुम्हारा चलता हैं मुझ पर फिर भी खुश कभी तुम हमसे होते नहीं,

बेमुरब्बत,बेदर्दी,बेहया कुछ भी कहते तुमसे बनता नहीं
पता नहीं क्यूँ तुम इस जिस्म में बसे हों जो तुम्हें सुहाता नहीं 
और तुम कभी इसे अपनाते नहीं 

जाते मुझे पूरी तरह छोड़कर नहीं और होकर भी मेरे कभी होते नहीं,
सितमों के तुम बादशाह बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी रहमत बरसाने आते हो,
दर्द के तुम जहाँगीर बन बैठे हो जो मेरे लिये भण्डार भराते हो, 
बहते हुए मेरे खूनी आंसुओं के तुम सरकार बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी सत्ता खड़ी कराते हो

कर्कशता तुम पर कभी मेरी शुरू होना सोचती नहीं,

मधुरता तुम पर कभी मेरी खत्म होना चाहती नहीं दोनों के बीच झूलती हूँ मैं जिसकी ढील तुम बढ़ाते हो और मेरी वफ़ा पर अपनी चालांकि हंसी का ठप्पा लगाते हो ....
मुझे नादान समझने की भूल तुम पहली दफा से आज भी दोहराते हो किसी पल में जाकर ये नहीं सोचते तुम मेरे प्यार के आगे खुद को कितना हारा हुआ पाते हो,
गुम हो अपनी ही धुन में तुम और अपनी ही चलाते हो 
मुझे ठुकरा कर दिल वाली पाने की इच्छा जताते हो....
रोती आखों से अब हँसी तुम पर आती है 
क्या खूब गजब हो तुम जिंदा को मुर्दा बनाकर 
जिंदगी जीयो का डंका बजाते हो।

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मेरे महबूब तेरी गलियां

मेरे महबूब तेरी गलियां मेरे लिए थी ही नहीं
बहुत ये चाहा मैंने पहुंच सकूँ तुझ तक 

पर तुझ तक पहुंचती राहें मुझे मंजूर करती थी ही नहीं

कैसे न बिखरने देती खुद को मैं जब सबकुछ तुम थे मेरे
पर मेरे नसीब से लड़ने को राजी तेरी चाहत थी ही नहीं


मेरे महबूब ये जो तेरी गलियां थी और ये जो तेरी चाहतों की मनमर्जियां थी

सिर्फ तुझ तक थी मुझ तक तो कभी ये भूल कर भी थी ही नहीं

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रविवार, 15 अक्टूबर 2017

शब्द



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प्रीत चुनरियाँ


सुनो सँवरिया 
तेरी याद में हो गई बावरिया 
बहुत बिताई जुदाई सँग रतियाँ
दर्पण में खुद की परछाईं को तुम मानकर तन्हाई से की जी भर बतियाँ
अनजानी सी सूरत तुम्हारी,अनसुनी सी बोली तुम्हारी
 ना नाम ना पता तुम्हारा फिर भी 
प्रेम के कागज पर ह्रदय की कलम से लिखी तुम्हें ढेरों चिठ्ठियां
और तुम फिर भी बने रहे बहरूपिया 
अब टूटा है सब्र का हर बांध और छूटी है मुझसे मेरी नगरिया
तुम तो हो बड़े ही कठोर और सब्रीले पिया पर
 हमारा ना लागे है अब तुम बिन जियरा 
तुम सँग ही अब भोर और तुम सँग ही अब ये 
साँझ देखेगी मेरे नयनों की उजिरिया 
आ रही हूँ होके प्रेम से सराबोर और ओढ़ मैं प्रीत चुनरियाँ।

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शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017



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बुधवार, 30 अगस्त 2017



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शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है


लोगों से मैंने खुद की तारीफ को इस तरह सुना है
कि
दिल मेरा शीशे सा साफ है
कोई ऐब नहीं,कोई ऐंठ नहीं
मन पर खुदा के नाम की चादर पाक है
शायद इसलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।


आँखें मेरी चंचला की दास है
कोई आखेटकी भाव नहीं, क्रुध्ता का स्वभाव नहीं
अश्रुओं पर सँतोषी पिपासा की आस है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।

होंठ मेरे गुलाब की छांव है
कोई कड़वाहट नहीं,कोई अपशब्द नहीं
वाणी पर सरस्वती का वास है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।

तन मेरा सलिल का आवास है
कोई मैल नहीं,कोई खिलकोटी खेल नहीं
आत्मा पर सर्वसूरती प्रेम के रंगों का आकाश है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।

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shayri



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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

शायरी

कुछ यूँ अलग ना हुए हो तुम मुझसे कि
इस तिमिर में भी मुझे तेरा चहेरा साफ दिखाई देता है
तू प्रत्यक्ष नहीं साथ मेरे पर तेरा अश्क मझमें परछाईं लिये हुए बैठा है।
 
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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

नैना


"नैनो को न पढ़ सके कोय,जो पढ़ लेवे इनकी जुवान,
 ते पंडित नाही प्रियतम होय"

नैनो की अदा कुछ इस तरह निराली है 

कि, ये शातिराना अंदाज में ठगते भी है,

और ठगने वालों से बड़ी होशियारी से बचते भी है ये।



नैना मायूसी के साथ टक-टकी लगाकर निहारते भी है,

और कटुता के साथ टक-टकी लगा कर घूरते भी हैं ये।



नैनों गुस्ताखी भी करते है,
और नाफ़रमानी भी करते है ये।

नैना सादगी रखकर चंचलता भी करते है,
और खूबसूरती रखकर चालांकी भी करते है ये।

नैना हस्ते हुए भी रोते है,
और रोते हुए भी हस्ते है ये।

नैना खामोश रहकर भी सबकुछ कहते है, 
और सबकुछ कह कर भी खामोश रहते है ये।

नैना अंजान होकर भी सब समझते है,
और सब समझकर भी अनजान बनते है ये।

नैना ख्वाबो में खो कर भी जीवंत होते है,
और जीवंत होकर भी खुद को खयालो में खोते है ये।

नैना न चाहकर हर शख्स को परखते भी है,
और चाह कर किसी की खातिर लूटने से भी नहीं खुद को बख्शते है ये।

नैना खुद को अश्रु रूपी सागर में डुबोये भी रहते है,
और खुद में विशाल सागर को सँजोये भी रहते हैं ये।

नैना इलतजाओं को ईशारों-इशारों में मंजूर भी करते है,
और एक ईशारे में उन्हें नामंजूर भी करते है ये।

नैनो से छुपे हर राज जाहिर भी होते है,
और हर राज छुपाने में माहिर भी होते है ये।

नैना बातों-बातों में 100 सवाल कर लेते है,
इनकी कोई भाषा नहीं फिर भी हर भाषा में बात कर लेते है ये।

मदमस्त हो जाये अगर ये नैना तो  नाचीजों पर भी मेहरबान हो पड़ते है,
और खफा हो जाये तो जिगरी यारों पर भी कहर बनकर बरस पड़ते है ये।


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मैं



मैं उसकी चाहत हूँ जिस पर दुनिया मरती है।

मैं उसकी हसरत हूँ जिसकी चाहत दुनियां रखती है।

मैं उसकी आँखों में बस्ती हूँ जिस पर से लोगों की नजर नही हटती है।
मैं उसकी हकीकत हूँ जो औरों का ख्वाब है।
मैं उसका गुरूर हूँ जिसे पाने का औरों को जुनून है।
मैं उसका दिल हूँ जो औरों की धड़कनों के बढ़ने का कसूर है।

मैं उसका अहसास हूँ जिस पर लोगों के डगमगाते ख्यालात है।
मैं उसका ईमान हूँ जिस पर अच्छे-अच्छो के इरादे बेईमान है।
मैं उसकी आस हूँ जो औरों की न मिटने वाली प्यास है।

मैं उसकी तमन्ना हूँ जो औरों की दिली खवाइश है।
मैं उसकी सादगी हूँ जो औरों के लिए ख़ूबसूरती की आजमाइश है।
मैं उसकी नजाकत हूँ जो गर रखे कदम साथ तो औरों की हौसला हाफ्जाई है।
मैं उसकी शरारत हूँ जो औरों की आह निकाल देने वाली हिमाकत है।
मैं उसका अरमान हूँ जिसकी हसरतो के जाम लोग पिया करते है।
मैं उसकी याद हूँ जिसकी याद में लोग जिंदगी गुजार दिया करते है।

और तो और मैं उसका जज्बात हूँ जिस पर लोग बहक जाया करते है।....................
...............................सच कहूँ  वैसे तो मैं कुछ भी नहीं ..................................पर मैं उसकी,पर मैं उसकी ,पर मैं उसकी रूह की वो छुअन हूँ जो मुझे उससे छिनने पर हर उस शख्श को झकजोर जाया करती है।



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शुक्रवार, 30 जून 2017

मेरा इश्क

मेरा इश्क भी मुकम्मल होता, अगर
 तू मुझे हाँसिल नहीं
मेरे इश्क में वफादार होता ।


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शनिवार, 24 जून 2017

महोब्बत की चाह

जीतना तेरी आदत है, तो हारना मुझे भी मंजूर नहीं
पर जीत अपनी तुझे, मैं 100 बार वार दूँ
क्यूँकि ये महोब्बत की चाह है, जंग की भूख नहीं।

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मेरी नजरों की कैद

मेरी नजरों से नजरें लड़ाने की कोशिशें तेरी, 
गर यूँ मुक्कमल हो जायेंगी,
तो बिन गुनाह के तुझे उम्र भर की कैद हो जाएगी।

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कैसे कह दूँ


कैसे कह दूँ गुस्ताख तेरे गुनाह ही है,
जबकि.......

मेरी बर्बादी की वजह तू ही नहीं तेरी यादें भी है।



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