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| लेखक : देवेन्द्र सोनी |
अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आँखों से अविरल धारा वह रही थी । वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे - आगे चल जरूर रहा था पर उसका मन उसी तेजी से पीछे भाग रहा था। साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे पर वह जानता था ये आंसू दरअसल उसके मन में चल रहे प्रायश्चित के आँसू भी हैं ।
उसे रह रह कर अफ़सोस हो रहा था कि वह अपने पिता के कहे अनुसार क्यों नही चला। क्यों उसने वह सब किया - जिनसे पिता हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे ।
बेचैन मन लिए वह जैसे तैसे थके कदमों से घर पहुंचा पर अब उसे कोई कुछ बोलने वाला नही था । कोई उसे प्यार और निस्वार्थ भाव से समझाने वाला नही था। वह एकांत में जाकर फिर फूट फूट कर रोने लगा । उसे लग रहा था कि - हो न हो , उसका विजातीय विवाह ही पिता की मृत्यु का कारण बना है । अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में शादी की है । एक बार भी उसने पलट कर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नही समझा और शहर से बाहर चला गया । बिना यह सोचे कि उसके बगैर मां पिताजी का क्या हाल होगा ।
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