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गुरुवार, 9 नवंबर 2017

मित्र


एक मित्र ऐसा हो
दिल मे धड़कन जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
आंखों में नूर जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सीने में सांसो जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सागर में नमक जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सुई में धागे जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
फूलो में खुशबू जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
जीवन में खवाबों जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
गंगा में पावनता जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
होठों पे हसीं जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
मंदिर में मूर्त जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सूरज की किरण जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
मोहब्बत में वफ़ा जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
शायरी में दर्द जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
अंधेरो में दीप जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
दर्द में टीस जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
इन्द्रधनुष में रंग जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
कृष्ण सुदामा जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो 
जो बिल्कुल तेरे जैसे हो
जो बिल्कुल तेरे जैसा हो......


@प्रदीप सुमनाक्षर










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शनिवार, 8 जुलाई 2017

वक्त

देखिए फिर ना मुझे 
इल्जाम दीजिएगा 
मैं गुजर गया तो फिर 
ना आवाज दीजिएगा 
एक मुद्दत से वक्त के 
पहिए को थामे हुए हूं मैं
हाथ छूट गया तो फिर 
ना हाथ दीजिएगा

।।प्रदीप सुमनाक्षर।।



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बुधवार, 28 जून 2017

राजनीति

वो कौन है जो कौम को बदनाम कर रहे
इंसानियत के सर पे गुनाह का ताज रख रहे। 
वो ना हिन्दू है और ना ही मुसलमान ही है वो

इंसानियत को रोज जो जर्जर नीलम कर रहे। 

चढ़ा दो उनको सूली पे काट हाथ पैर
बहन बेटियो पे जुल्म जो सारे आम कर रहे। 
कुर्ता जिनको प्यार है तिरंगे के दाम से

ऐसे नेताओं को भगाओ इस  जहान से। 

राष्ट्र को बेच बेच जो नित है खा रहे
झुटे भाषणों से है वो दिल बहला रहे।
देश उनको प्यारा है हर पल दिखा रहे

आवाम को जो भूखे रातो सुला रहे। 

देश मे कमी नही जरा भी अन्न धन की
किसानों को जो भूखा फांसी चढ़ा रहे
ये इतने सच्चे ईमानदार है मुझे आता नही समझ

यहाँ पेट भरना है मुश्किल इनके खाते बढ़े जा रहे

।। प्रदीप सुमनाक्षर ।।


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रविवार, 25 जून 2017

दो कदम

दो कदम तुम चलो
दो कदम हम चले
शिकवे दूर हो ना हो
आओ फिर से हम मीले गले। 

कोई नही है सम्पूर्ण जग में
इस बात को दिल मे धरे
भूल कर एक दूजे के दोष
आओ फिर से हम मीले गले। 

कुछ मैं , कुछ तुम अपनी कहो
किसी बात पे रूठे किसी पे लडे
पर प्यार के क्षितिज पे खड़े हो
आओ फिर से हम मीले गले। 

जरूरी है उल्फत में झगड़े भी
रूठना मनाना औऱ लफड़े भी
चलो भूल सब  प्यार बढ़ाये
आओ फिर से हम गले मिल जाये। 

ऐसा है अब नखरे ना  दिखा
मुँह को इस तरह न बना
सब भूल आया पास तेरे
बांहे फैला और गले लगा
आ, आओ ना, मेरे क़रीब आ। 

।।प्रदीप सुमनाक्षर।।

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वो

सितारों में वो आफताब सी है
सच उसकी मुहब्बत लाजवाब सी है

गुलों में वो गुलाब सी है
सच उसकी अदायें बेमिसाल सी है

ऋतुओं में वो बहार सी है
सच उसमें कारीगरी कमाल सी है

वफाओ में वो बेहिसाब सी है
सच मुझे वो नमाज सी है

।। प्रदीप सुमनाक्षर।।


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