मंगलवार, 21 नवंबर 2017

लघु कहानी - संगति

जरा हटकर - लघु कहानी - संगति 


       संगति का असर तो होता ही है , यह बात रमेश को उस समय समझ आई जब एक माह तक अपनी बुरी आदतों को छोड़कर वह सादगी से अपने कर्म में जुटा रहा । उसके व्यवहार परिवर्तन के बाद ही रमेश के " गुरु जी ' आज घर आ रहे थे। वह उनके आगमन से उत्साहित और प्रसन्न था । साथ ही उसे यह पछतावा भी हो रहा था कि - काश ! पहले ही उसे सच्चा मार्गदर्शन क्यों नही मिला । क्यों उसने अपने परिजनों की समझाइस पर ध्यान नही दिया ? पर कहते हैं ना - जब जागे तभी सबेरा । यही सबेरा अब रमेश की बर्बाद होती जिंदगी में खुशहाली लेकर आया था । उसे याद आ रहा था - कैसे अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए वह गलत संगत का शिकार हुआ और शराब - शवाब को अंगीकार कर अपने हंसते - खेलते परिवार से धीरे - धीरे दूर होता चला गया । सुबह से रात तक सिगरेट शराब का आदि हो चुके रमेश को कई बार सबने समझाया पर उस पर कोई असर नही हुआ लेकिन जब व्यवसाय बैठ गया तो उसके एक मित्र ने उसे एक सिद्ध पुरुष से मिलवाया । कुछ सोचकर महात्मन ने रमेश से कहा - सब ठीक हो जाएगा पर इसके लिए तेरे घर में एक अनुष्ठान करना होगा। 
   अपनी अनेक परेशानियों से घिरे निराश रमेश ने इस हेतु सहर्ष स्वीकृति दे दी लेकिन गुरूजी ने घर में प्रवेश करने से इंकार कर दिया । रमेश ने जब कारण जानना चाहा तो अपने नेत्र बंद कर वे बोले - तेरे घर से शराब की बू आ रही है । ऐसे में मातारानी का अनुष्ठान नही हो सकता । तुझे सिगरेट और शराब छोड़ना होगी । यदि ऐसा कर सका तो एक माह बाद अनुष्ठान हो सकेगा जिससे तेरी सारी परेशानी दूर हो जाएगी और व्यवसाय फिर चल पड़ेगा । साथ ही परिवार में भी सुख शांति आ जाएगी। गुरूजी की बात सुनकर रमेश पशोपेश में पड़ गया लेकिन तुरन्त ही स्वयं को सम्हालते हुए उसने गुरूजी को वचन दे दिया कि - अभी से ही वह सिगरेट और शराब को हाथ नही लगाएगा और उसने यह कर दिखाया। 
   आज एक माह हो गया था । गुरूजी अनुष्ठान के लिये घर आ रहे थे । परिवार के सभी सदस्य खुशी खुशी अनुष्ठान और गुरूजी के स्वागत की तैयारी में जुटे थे। अनुष्ठान पूरा हुआ और कुछ ही दिनों में सार्थक परिणाम भी दिखने लगे । 
       रमेश ने दोनों प्रकार की संगत का असर देख लिया था । वह समझ  गया था - अच्छी और बुरी संगत के परिणामों को ।
    - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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रविवार, 19 नवंबर 2017

जुनून ऐ शिखर

बंदिश अगर लबों पर होती, महखाने और पबों पर होती
तो बातें तुम्हारी आँखों से होती, और नशा तुम्हारी सांसों से होता
   
यूँ टकराती आँखें,पैमाने सी खनक होती
यूँ टकराते जाम लबों से, और लहर सांसों में होती

लोग इश्क को यूँ बदनाम न करते, राह चलते यूँ सरेआम न करते   

हर कोई ढूंढ़ता “जुनून ऐ शिखर”, फिर नशे को यूँ बदनाम न करते 
 - सुभाष वर्मा 

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लेख - छीन रहे हैं बचपन , भारी होते बस्ते




        वर्तमान में बच्चों के भारी होते बस्तों से सभी त्रस्त हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा और सबसे आगे रहने की चाह में खुलकर कोई भी इसका विरोध नही करता है और न ही खुद से कोई पहल ही करता है  क्योंकि बदले समय के लिहाज से अब यह आवश्यक लगता है।
       डिजिटल युग में आज बच्चों की मनोवृत्ती भी बदल गई है । परिस्थितिवश खेल कूद और अन्य गतिविधियों से उनका मोह भंग हो गया है । मैदानी अभिरुचि का स्थान किताबों और यांत्रिकता ने ले लिया है। मोबाइल और कम्प्यूटर भी आधुनिक शिक्षा के पर्याय बनते जा रहे हैं ।

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अरमान



जरा हटके - नई कविता 

कितने अरमान मचलते हैं
मन के अंगना में हमारे
जुटे रहते हैं -
पूरा करने में इन्हें 
जीवन भर हम ।

चैन से सोने भी नहीं देते हैं ये
सहोदर होती हैं इनकी
नित नई उलझनें और चिन्ताएं
जो दुस्वार कर देती है जीवन हमारा ।

अरमानों को जब तक 
नियंत्रित करना नहीं सीखेंगे हम 
तब तक नैराश्य और अवसाद
का घर बना रहेगा , मन में हमारे। 

मुक्ति पा नी ही होगी हमको
अरमानों की बहुलता से 
होना ही होगा संतुष्ट इससे कि
जो मिला है और निरन्तर मिल रहा है
बहुत है वह , औरों की अपेक्षा।

देखा है मैने , उन्हें भी जो
रहते हैं बिंदास फुटपाथ पर
दो जून की रोटी कहीँ से भी पाकर 
और उन्हें भी देखा है - जो,
सोते हैं सुकून से 
हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी
पत्थरों पर ।

ज्यादा फर्क नही है ,
उनमें और हम में 
वे भी हाड़-मांस के पुतले हैं
और हम भी वही हैं ।

फर्क है तो बस इतना -
वे उन अरमानों से मुक्त 
रखते हैं खुद को ,
जिन्हें हम पालते रहते हैं
अदम्य जिजीविषा के चलते
मन में अपने । 

नही कहता - 
बुरा है अरमानों में जीना 
पर जिएं भी तो 
जीने की ही तरह । 

      - देवेंन्द्र सोनी , प्रधान सम्पादक
        युवा प्रवर्तक, इटारसी ।

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मंगलवार, 14 नवंबर 2017

बचपन के वो पल सुहाने



जरा हटके - नई कविता 

याद आते हैं , दिन पुराने 
बचपन के वो खेल - तमाशे
थे कितने वे पल सुहाने । 

लुका - छिपी खेलते - खेलते
खो - खो में खो जाना
गिल्ली हो या गेंद लपकने
जी भर दौड़ लगाना ।

लँगड़ी , पिट्ठू या कबड्डी 
रोज ही मन ललचाते थे 
इतने पर भी लगे अधूरा , तो
दंड - बैठक खूब लगाते थे । 

जाने कितनी है यादें , जो
भूली बिसरी सी लगती है ।

पाठशाला से मिली जो शिक्षा
आज नहीं बिसराती है।
जीवन में पल - पल , अब भी 
काम वही आती है । 

बीता समय , बीती बातें 
याद बहुत आती हैं ।

दिखते नहीं अब खेल पुराने
बदल गए हैं रिश्तों के माने
मस्ती के दिन अब हुए हवा
जीवन के ये कैसे ताने - बाने ।

परियों की वे कथाएं ,
दादी - नानी जो सुनाती थी ।
छिपे मर्म उनमे जो रहते
अंतस में चिपकाती थीं । 

ज्ञानी - ध्यानी ,वीर - महापुरुषों से
नाना - दादा मिलवाते थे ।
बातों ही बातों में , वे 
जीवन का पाठ पढ़ाते थे।

बीता समय और बीती बातें
अब याद बहुत आतीं हैं ।

हमने जो देखा - समझा 
साथ बड़ों के रहकर 
सिखा न सकते अब हम
बच्चों को सब कुछ भी देकर ।

नया जमाना , नई बातें 
कम ही हर्षाती हैं ।
रह - रह कर बीते दिनों की
याद बहुत आती है ।

              - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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अजीब तेरा-मेरा इश्क


अजीब है ना तेरा इश्क
मुझे तेरी आँखों में दिखता नहीं
और तेरी जुवां पे टिकता भी नहीं
तुझसे वफ़ा करते बनता भी नहीं
और बेवफाई का पड़ा पर्दा हटता भी नहीं
गिरगिट जैसा रंग तेरा एक रंग में तू ढलता नहीं
बातें है चाशनी से तर बिन मक्खन के जिन पे काम चलता नहीं
इन सब के वाबजूद भी तू मेरी नजरों से गिरता नहीं
और अपनी उस पुरानी छवि से ऊंचा उठता भी नहीं
अजीब है ना मेरा भी तुझसे इश्क
जो
चीखों पर भी राहत गहन करता नहीं
चोट पर भी अगले कदम को सम्भलता नहीं
चाहने के गुनाह से हरगिज बचता नहीं
ना चाहने का गुनाह भूलकर भी  करता नहीं।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

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शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

ये दिल ❤


ना तुमने कभी मुझे समझा
ना तुमने कभी मुझे जाना
ये दिल फिर भी तुम पे मरता हैं
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता है

रहोगे कब तलक जाली सलामों  में
चलोगे कब तलक झूठी शानों में
खो  जाएगी एक न एक दिन सोच तुम्हारी मेरी चाहत के महखाने में

फरक तुम पर नहीं पड़ता तुम हो कुछ ऐसे गुमानो में
राह थामी तुमने जिसका मंजिल से ना वास्ता ना ही पता ठिकानों में
आओगे थक कर तुम एक न एक दिन मेरे ही आशियाने में

ना तुमने कभी मुझे समझा
ना तुमने कभी मुझे जाना 
ये दिल फिर भी तुमपे मरता है
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता हैं

वस्ल की राते गुजरती तुम्हारी हर हसीना के नजराने में
बहकते हो तुम दिन में भी जिस्म की खुशबू के तराने में
रोओगे जरूर एक न एक दिन तुम मेरी याद के बीते जमाने में

कर-कर अपनी मनमानी मजाक बनाते मेरा तुम अपने यारों के गुठ को और रंगीन बनाने में
भरता ना दिल तुम्हारा तो जिद्द कर जाते मुझसे ही मेरी हालत बयाँ करवाने में
देख लेना वादा है तुमसे ये मेरा तरस जाओगे तुम एक दिन और बिखर भी जाओगे तुम उसी दिन फिर से मुझ जैसी महबूबा पाने में।

न तुमने कभी समझा
न तुमने कभी जाना
ये दिल फिर भी तुमपे मरता है
ये दिल फिर भी तुम्हें प्यार करता है।

Written By  Ritika {Preeti} Samadhiya.... Please Try To Be A Good Human Being...✍

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गुरुवार, 9 नवंबर 2017

अभिव्यक्ति - आधुनिक जीवन शैली में रिश्तों की सार्थकता

जरा हटके - लेख -
आधुनिक जीवन शैली में रिश्तों की सार्थकता

     जीवन शैली पुरातन हो या आधुनिक, रिश्तों की सार्थकता पर प्रश्न सदैव उठते रहे हैं । जहां रिश्ते होंगे वहां प्यार , दुलार , मनुहार भी होगा और मन मुटाव या झगड़े भी होंगे ही । मेरी नजर में रिश्तों का स्वरूप सदैव स्थाई होता है लेकिन उसका महत्व कम या ज्यादा होता रहता है । यहीं से उनकी सार्थकता या निरर्थकता का आंकलन होता है। 
     रिश्ते दो तरह के होते हैं । एक - खून का रिश्ता और दूसरा धर्म का रिश्ता । पहली तरह के रिश्तों की परिभाषा हम सब जानते हैं । दूसरी तरह का रिश्ता अर्थात धर्म का रिश्ता मैं उसे मानता हूँ जो किसी से मानसिक और भावनात्मक लगाव के कारण बनता है । इसे मैं सिर्फ मित्र की श्रेणी में रखता हूँ । इसमें आभाषी और व्यक्तिगत जुड़ाव शामिल है। इन रिश्तों का स्वरूप धर्म के भाई बहन का भी होता है जो मित्रवत ही होते हैं। दैहिक आकर्षण युक्त रिश्तों को मैं अस्थाई मानता हूँ। यहां अपवाद हो सकते हैं ।


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मित्र


एक मित्र ऐसा हो
दिल मे धड़कन जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
आंखों में नूर जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सीने में सांसो जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सागर में नमक जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सुई में धागे जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
फूलो में खुशबू जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
जीवन में खवाबों जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
गंगा में पावनता जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
होठों पे हसीं जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
मंदिर में मूर्त जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
सूरज की किरण जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
मोहब्बत में वफ़ा जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
शायरी में दर्द जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
अंधेरो में दीप जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
दर्द में टीस जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
इन्द्रधनुष में रंग जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो
कृष्ण सुदामा जैसा हो
एक मित्र ऐसा हो 
जो बिल्कुल तेरे जैसे हो
जो बिल्कुल तेरे जैसा हो......


@प्रदीप सुमनाक्षर










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बुधवार, 8 नवंबर 2017

बाटा वाली चप्पल


मिट्टी मे मिट्टी होकर हम खेल खेलते थे
पूरा होने से पहले ही बिगाड चुके होते थे
झगडकर एक दूसरे के फिर बाल नोचते थे
कुछ इस तरह खत्म होता था एक खेल
फिर हम दूसरा खेलते थे
वो बचपन महान था ना दोस्तो
जब बाटा वाली चप्पल जोडकर पहनते थे

जब घर मे सब बच्चो के नए कपडे आते थे
छोटे को वही चाहिए जो बडे के होते थे
कपडो के रंगो पर भी तो कितने झगडे होते थे
ये वो फैसले थे जो कभी नही होते थे
और हम अपने नए कपडे जूते साथ लेकर कंबल मे सोते थे
वो बचपन सच मे महान था दोस्तो
जब बाटा वाली चप्पल जोडकर पहनते थे

असली तूफां तो घर मे उस वक्त आ जाते थे
जब भाई मेरी गुडिया का मुंडन कर देते थे
रोता देख मुझे माँ पापा मेरी तरफ होते थे
सिर्फ डांट खिलाकर शांत नही होती थी मै
मैने भी उसके हैलीकाप्टर के पंख तोड दिए थे
वो बचपन सच मे महान था दोस्तो
जब बाटा वाली चप्पल जोडकर पहनते थे

रात को आफिस से जब पापा घर आते थे
जान बूझकर सोने का दिखावा करते थे
अचानक जागकर उनको डरा देते थे
पापा भी डरने का नाटक बखूबी करते थे
फिर एक दूसरे की शिकायते करते हुए सोते थे
वो बचपन महान था ना दोस्तो
जब बाटा वाली चप्पल जोडकर पहनते थे

हर दिन माँ पापा हमे नए नाम से बुलाते थे
प्यार जताने के उनके ओर भी बहोत तरीके थे
कब नहीं छलके थे उनके आँसू 
जब कभी सिर तो कभी हमारे घुटने फूटे थे
बेशक वो दौडकर हमे डाक्टर तक ले जाते थे
पर वो फूंक वाले मरमह ज्यादा असर करते थे
वो बचपन महान था ना दोस्तो
जब बाटा वाली चप्पल जोडकर पहनते थे

~Anupama verma

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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मगरूर

जरा हटके - नई कविता



आते हैं जब 
इस दुनिया में हम
कितने सहज , सौम्य और 
निश्छल होते हैं ।

धीरे-धीरे होते हैं प्रभावित
और अपनाने लगते हैं 
उस वातावरण को , जो
कराता है हमसे मनमानी ,
बनाता है क्रमशः हमको मगरूर ।

सिखाने लगता है
दुनियादारी और
बोने लगता है 
मन में हमारे 
बीज मगरूरता के ,
करते रहने को मनमानी।

हाँ , हर कहीं भी नहीं पनपते हैं 
मगरूरता और मनमानी के ये बीज 
इन्हें चाहिए होता है
वह खाद - पानी भी 
जो मिल जाता है आसानी से
हमारे ही आस- पास  के परिवेश में ।

बदलते युग में मिल रही
मनचाही सुविधाएं भी 
एक बड़ा कारण होता है
मगरूर और मनमौजी होने का हमारे 
उन सबके बीच जो
वंचित हैं इन सुविधाओं से ।

मगरूर या मनमर्जी के होना 
कोई अच्छी निशानी नही है
व्यक्तित्व के हमारे
मगर करते कहाँ हैं 
परवाह हम इसकी ।

यही लापरवाही, अनदेखी
कर देती है हमारे अंदर 
मगरूर और मनमर्जी के 
पेड़ को इतना बड़ा
कि जब वह होता है फलित तो
देने लगता है ऐसे विषैले फल
जो करते हैं , केवल और केवल
हमारा ही संहार ।

सोचना और लाना होगा 
वह परिवर्तन जो 
बचा दे हमको 
मगरूरता या मनमर्जी के इस पेड़ से 
और सफल कर दे , 
जीवन हमारा ।

          - देवेंन्द्र सोनी, प्रधान संपादक
           युवा प्रवर्तक , इटारसी ।

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शनिवार, 4 नवंबर 2017

लेखन की शुरुआत कैसे करें - लेखन रणनीति / How to Start Writing - Writing Strategy by Subhash Verma





दिमाग में उत्पन्न विचारों, कल्पनाओं को कागज पर उकेरना एक चित्रकार और लेखक की कला है, फर्क सिर्फ इतना है की एक रंगों से अपनी कला को सजाता है तो एक शब्दों से। दोनों कलाओं में महत्वपूर्ण है जुड़ाव, कहीं रंगों का तो कहीं शब्दों का। 
जब तक एक चित्रकार अपनी रचना को आपस में जोड़ नहीं देता तब तक वो चित्र नहीं बनता उसी तरह एक लेखक जब तक अपनी रचना के हर हिस्से को एक दूसरे से नहीं जोड़ देता वो रचना नहीं कहलाती। 

जब लेखक लिखने बैठता है तो हर पहलु के बारे में सोचकर उसे पूर्ण करता करता है,  

लेखन शतरंज के खेल की तरह है फर्क सिर्फ इतना है की यहां आखिरी चाल सबसे पहले सोची जाती है : सुभाष वर्मा  
 अब अगर आप लिखना चाहते हैं तो खुद से पूछिए की आप लिखना क्यूँ चाहते हैं, अब जानते हैं की लिखना शुरू कैसे करें......  

1. डायरी में नोट करना शुरू करें / ढांचा तैयार करें (Make the template) : आपके पास विचार हैं, नए आइडियाज हैं ...आप उन्हें लिखना चाहते हैं ...पर जब लिखने बैठते हैं तो भूल जाते हैं, लेखकों के साथ अक्सर ऐसा होता है। इसलिए एक डायरी ले और हर विचार को उसमे लिखते रहें। कम से कम शब्दों में लिखें.....पर कल पर मत छोड़ें।  बाद में यही लिखे हुए विचार/आइडियाज आपको एक बेहतरीन कहानी, कविता उपन्यास लिखने में मदद करेंगे। 

2. विश्लेषण (Analysis / Research ) करें : अगर आप कहानी या ब्लॉग आप लिख रहें हैं तो उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करें, ब्लॉग पढ़ें, इंटरनेट पर पढ़ें। एक अच्छे लेख के लिए आपकी जानकारी बिलकुल सही होनी चाहिए। विचारों को एकत्रित करे। बिना जानकारी या गलत लिखना आपको हंसी का पात्र बना देगा और पाठक आपकी रचना पर ध्यान नहीं देगा।.....


3. अच्छे पाठक बने : एक लेखक का काम सिर्फ लिखना भर नहीं है उसे पढ़ना भी चाहिए परन्तु एक पाठक के नजरिये से नहीं बल्कि एक लेखक के नजरिये से। एक लेखक का नजरिया विश्लेषणकरने का होता है, ये जरुरी नहीं की आप किसी अच्छे और जानेमाने लेखक को ही पढ़ें, आपको ये जानना है की कैसे लिखी गयी रचना को और बेहतर किया जा सकता है, कैसी कल्पना की गयी है। 
अच्छे लेखक अच्छे पाठक भी होते हैं। 
फेसबुक पर हजारों ग्रुप हैं, हजारों की संख्या में लेखक भी हैं, बहुत से लेखक वहां अपनी रचना लिखते हैं और गायब हो जाते हैं, और ज्यादातर ऐसा ही करते हैं, पर पढ़ना कोई नहीं चाहता। कुछ तो जानते ही नहीं की पाठक कैसे मिलें।   

4.टुकड़ों में लिखें : ये जरूरी नहीं की आप बैठ का एक ही बार में पूरी कहानी लिखें या पूरा उपन्यास लिखेंगे, कहानी के लिया तैयार किया गया ढांचा भरें, पृष्ठभूमि तैयार करें।   

5. हर रोज लिखना शुरू करें : ये थोड़ा मुश्किल लगता है पर है नहीं, ये जरूरी नहीं की आप एक ही दिन में सबसे बेहतर लिख डालेंगे, हर रोज लिखने की आदत डालिये, थोड़ा-थोड़ा अपने समय के अनुसार लिखिए, अगर लेखन आपका जूनून है तो इसके लिए समय निकालिये।  

6समीक्षा और संपादित (Review and Edit ) न करें आप लिखना शुरू कर रहें है तो अभी से समीक्षा और संपादित न करें, बस लिखते चले जाईये,  एक बार लिखने के बाद ही समीक्षा और संपादित करें, ऐसा करने से आप मुख्य धारा से विचलित नहीं होंगें। परन्तु प्रकाशित समीक्षा और संपादित करने के बाद ही करें।  

7. सम्पर्क बनाएं :  अक्सर हम देखते हैं की लेखक, या अत्यधिक विचारणीय लोग अकेले रहना पसंद करते हैं, अक्षर वो खुद से ही बातचीत करते रहते हैं, सोचते रहते हैं, पर वो ऐसा हर जगह नहीं करते ....वो अपने जैसे लोगों से संपर्क में रहते हैं, अगर आप लेखक हैं तो लेखकों से सम्पर्क बनाने की कोशिश करें, ये आपको बेहतर कार्य करने में मदद करेगा, आपके सोचने, समझने और लिखने का नजरिया बढ़ेगा, आस-पास होने वाले आयोजन के  बारे में जानने में मदद करेगा। आयोजन में शामिल हों और सीखते रहें। 

8. सोशल मीडिया मंच (social media platform): अपने आपको सोशल मीडिया पर सक्रिय रखें,  इसका मतलब ये कतई नहीं की आप सारा दिन सक्रिय रहें।
 परन्तु जब आप लिख या विचार कर रहें हैं तो इंटरनेट को बंद ही रखें (लिखने के दौरान क्या करें, क्या नहीं, किसी अन्य लेख में जानेगे )


 इन सब बातों को ध्यान रखते हुए आप बेहतरीन लिखना सुरु कर देंगे। अगले लेख में जानेगे की कैसे लिखें और लेखन के दौरान क्या न करे। 

अगर आपको जानकारी पसंद आए तो कृप्या अपनी राय दे, और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए हमें मेल करें।

पढ़ें  


धन्यवाद 



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शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

लेख , जरा हटकर - स्त्री - पुरुष , एक दूसरे के पूरक हैं या प्रतिद्वंदी ?

 स्त्री - पुरुष , एक दूसरे के पूरक हैं या प्रतिद्वंदी । यह एक ऐसा प्रश्न या गम्भीर विषय है - जिसका उत्तर हर एक की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कहीँ यह समानता के रूप में , कहीँ पूरक तो कहीं प्रतिद्वंदी के रूप में देखने को मिलता है । यदि हम पीछे देखें तो पाते हैं सृष्टि में सबसे पहले आदम और हब्बा आए । कैसे आए , कहाँ से आए , यह अनुत्तरित ही है। खैर ! उस समय दोनों ने एक दूसरे की आवश्यक्ता को समझा और सहयोगी बनकर संतति को आगे बढ़ाया । तब दोनों में  एक - दूसरे के लिए पूरक का भाव ही था जो आगे भी सामाजिक व्यवस्था के तहत सहजता और आपसी समन्वय से चलता रहा ।      

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मनचाही पांव की जमीं


कदम रूके नही मेरे
थके नही है हौसले
मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे

सौ बार राह से भटके थे
'सोचा लौट चले' ऐसे भी अटके थे
पर बीच समंदर आ कर के
लौट जाना नादानी है
उम्मीदे फुसफुसायी इसे पार कर ले
कुछ यूँ गिरते हौसले उसने संभाले थे
मनचाही पांव की जमीं 
हम भी पाने को बेताब थे

तेरी जमीं नही इस जहान मे
सबके यही विचार थे
क्यूँ ये जहां रास नही तुझे 
तू उडने चली आसमान मे
फिर मै और मेरा साया मुस्कुराए थे
कुछ यूँ हमने
आशाओ के तार निराशाओ पर गिराए थे
मनचाही पांव की जमीं
हम भी पाने को बेताब थे

तूफां के सिलसिले है जोर पे
सब नाजुक तिनके सा मुझे कहे
उडा के कहाँ ले जाऐंगे
तू अभी सोच भी ये ना सके
मैने लम्बी सांस भरकर कहा
मुझे डर नही है तूफां से
उम्मीद है उडे तो
सही जगह ही जा गिरे
और मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे

~Anupama

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कोई क्या कहेगा



पूरी जिंदगी 
परवाह करते हैं हम 
इस बात की -
कि - कोई क्या कहेगा !

खो देते हैं इससे 
वे कई पल और खुशियां
जिनसे संवर सकता था
और अधिक 
घर - संसार हमारा ।

इस एक दंश से 
मुरझा जाते हैं , कभी - कभी
बेटे और बेटियों के भविष्य
या कई दफा , सपने भी हमारे।

देखते और सोचते हैं 
अक्सर ही हम , इसी रूप में
इस प्रश्न को
पर मेरी नजर में - होता है ,
एक पहलू और भी इसका।

बचाता है यही डर , बार - बार
अनेक अप्रिय स्थितियों से भी हमको।

सोचें , तो मिलेगा उत्तर यही
सिक्के के दो पहलू की तरह ही है
परिणाम भी इसके ।

कभी बचाता है तो कभी
डुबाता भी है प्रश्न यह - 
कि - कोई क्या कहेगा ? 

समझकर इसे -
लें अपने विवेक का सहारा 
और करें वही - 
जिसके  सुखद हो परिणाम ।

     - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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