बुधवार, 13 मई 2020

लेखक ?



बहुत ही कठिन होता है जवाब देना जब कोई पूछता है की आप लेखक क्यूँ हैं या लिखना क्यों पसंद करते हैं। जवाब देना और अधिक कठिन हो जाता है जब मैं खुद से पूछता हूं की 

“मैं लेखक क्यूं हूं ?”

“यह मेरी इच्छा है या विकल्प ?”


फिर मैं खुद से पूछता हूं की एक लेखक के पास क्या होता है ?


  • कलम और विचारों की स्वतंत्रता।


यही विचारों की सवतंत्रता ही किसी भी लेखक को विशिष्ट बनाती है। लेखक अपने आप में विशिष्ट होता है क्यूंकि वह एक कलाकार है, शब्दों को पिरोकर एक मोतियों की माला तैयार करता है।

वह सिर्फ शब्दों का कलाकार ही नहीं वह सच बोलने का साहस भी रखता है, समाज का आईना बनकर समाज का मार्गदर्शक भी करता है। लेखक को सिर्फ शब्दों का सौदागर नहीं कहा सकता। 


मुंशी प्रेमचंद जी के अनुसार “लेखक समाज की हाँ में हाँ मिलाने मिलाने वाला निष्क्रिय पदार्थ नहीं होता, उसका अपना व्यक्तित्व होता है और वह अपने विशिष्ट दृष्टिकोण से समाजिक समस्याओं पर विचार करता है। “


इसलिए लेखक को सिर्फ लेखन तक ही सीमित नहीं माना जा सकता; वह इससे कहीं ज्यादा होता है, लेखन उसके लिए एक माध्यम है और यह माध्यम समुद्र की तरह इतना विशाल है की इसका किनारा भी दिखाई नहीं पड़ता। इसी समुद्र में कलम रूपी नाव लेकर निकले नाविक को ही लेखक कहा जा सकता है।


मेरे लिए :

“लेखन एक ऐसी कला है जहां मैं खुद को चुनौती दे सकता हूं, हर बार मैं कुछ नया कर सकता हूं।” - सारथी 


नित नए सपने और हद से आगे जाने का जुनून  …लेखन ही है जो ये सब करने की आजादी देता है।

  • जहां मैं पल भर में आसमान से परे जा कर खुद को महसूस कर सकता हूं।

  • जहां मेरे सोचने, समझने और लिखने पर कोई पाबन्दी नहीं है।

  • जहां मैं हर बार कुछ नया कर सकता हूं।


लेखक होना अपने आप में सम्पूर्ण होना (लेखक के लिए ) है जहां उसके ख्वाबों की दुनिया आँखों के सामने होती है। यह सबके लिए अलग - अलग हो सकता है, मगर , दुनिया सामने वह एक विशिष्ट व्यक्ति ही होता है। आपका विकल्प आपको एक सम्पूर्ण एहसास नहीं दे सकता, आपकी इच्छा या वैकल्पिक इच्छा ही आपके सम्पूर्ण एहसास का कारण हो सकती है। 

एक लेखक की दिनचर्या के कुछ हिस्से मैं आपके सामने रखता हूँ जिन्हें सर्व सहमति से स्वीकारा जाता है। 

  • एक लेखक उन क्षणों में भी सोचता है जब वह अपने आपको व्यस्त महसूस करता है।  

  • हर बातचीत, हर दृश्य, हर अहसास उसके दिमाग को सोचने के लिए कच्चा माल है। 

  • एक लेखक अपने आप को नितांत अकेला महसूस करता है, ऐसा करके ही वह विचारों को कलमबद्ध कर पाता है। 

  • लेखक अक्सर खुद से बातें करते हैं। विशिष्ट लोगों में ऐसे गुण देखे जाते हैं। 


नोट: यह लेख सिर्फ लेखकों को जानने और प्रेरित करने के लिए लिखा गया है, जो मेरे व्यक्तिगत विचार हैं इसलिए वैचारिक सहमति जरूरी नहीं है। आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा। 


- सारथी 

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शुक्रवार, 1 मई 2020

हम आते हैं

मजदूर दिवस पर विशेष :-

हम आते हैं  / हम आते है 
अपना लहू बहाते हैं 
जीवन रस का बूंद बूंद हम धरती पर टपकाते हैं 
बादल की बूदों से बनता सागर
 हम भव्य अट्टालिका बनाते हैं 
हम आते हैं  / अपना लहू बहाते हैं 

जीवन की इस धारा में हम
 किसान मजदूर कहते हैं 
खेतों से लेकर सड़कों तक हम मेज
जीवन को सरल बनाते हैं
 हम आते हैं  / अपना लहू बहाते हैं 

नगर बनाते - शहर बनाते 
सड़कों पर रात बिताते हैं 
खेतों में अन्न उगाने पर भी 
भूखें पेट सो जाते है 
हम आते हैं / अपना लहू बहाते हैं 

बड़े - बड़े महल अटारी वाले 
आज मजदूर दिवस मनाते हैं 
जीवन रस की खोज में हम 
प्यासे ही सो जाते है 
हम आते हैं  / हम आते है 
 अपना लहू बहाते हैं

लेखक : अरविंद कुमार 

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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

धरती और माँ


धरती कितना कुछ देती है 
अन्न
जल
हवा
पानी
और हम 

धरती को 
काटते है 
खोदते है 
सीना कर देते है छलनी 
पर 

फिर भी वो मुस्कराती है 
बिल्कुल 
माँ की तरह 
जिसकी छाती से पी जाते है 
हम खून  का कतरा- कतरा
बिल्कुल दूध  की तरह 
फिर भी 

धरती 
हँसती है , मुस्कराती है 
अपनी
अस्थि मज्जा तक खिलाती है 
बिल्कुल माँ की तरह ।

      अरविन्द कुमार मौर्य 
         हिंदी विभाग 
        कुमाऊँ विश्वविद्यालय 
      नैनीताल , उत्तराखंड

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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

कोरोना: एक आर्थिक छद्म विश्वयुद्ध




आज, जहां पूरी दुनिया महामारी की आग में झुलस रही है , वहीं चीन, जो इस महामारी का कारक है ,  महाशक्ति बनने के सपने देख रहा है। उसके इस सपने की कीमत पूरी दुनिया चूका रहा है।
क्या यह एक छद्म विश्व युद्ध का हिस्सा है ?
हाल ही में #Amazon द्वारा प्रकासित किताब कोरोना: एक आर्थिक छद्म विश्वयुद्ध में जानिए इससे जुडी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी व् डरवाना सच !

कोरोना: एक आर्थिक छद्म विश्व युद्ध (Hindi Edition) Kindle Edition


publisher: Amazon Publication
available only on Amazon.

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मजहबी भूख




वसंत अपने समापन की ओर था, वृक्षों पर नए पत्तों ने नव जीवन धारण कर लिया था। प्रकृति खूब खिलखिला रही थी। उसके खिलखिलाने और ऐसा लगने के पीछे एक कारण यह भी था की इंसान मजबूर होकर घरों में कैद था। दूसरा यह की आधुनिक संसाधनों के बीच इंसान प्रकृति की उस सुंदरता और अपनेपन को महसूस कर रहा था। ठीक उसी तरह जैसे एक अबोध बालक कोई संकट भांपकर अपनी माँ की गोद में छुप जाता है।
कृष्ण चंद्र ठाकुर घर के आंगन में अकेले बैठे ऊंघ रहे थे। नीम के पेड़ की गहरी छाया और शीतल हवाओं का यह आनंद उन्हें बरसों बाद प्राप्त हुआ था। पैसे की दौड़ - धुप में सब कुछ पीछे छूट गया था, अब यह आनंद पाकर वह कहीं जाना नहीं चाहते थे।
घर के ठीक सामने एक और मकान था, जिसमे उस्मान मियां रहते थे। वाराणसी में लंका मार्किट में उनकी किराने की दुकान थी। आजकल छुआछूत की बीमारी के कारण दुकान न जा पाते थे।दिल में सेवाभाव था और घर खाली बैठे मन न लगता था इसलिए वे किसी सामाजिक संगठन के साथ मिलकर जरूरत मंद लोगों की सहायता करने चले जाया करते थे।
सुबह - सुबह मियां ने ठाकुर को पुकारा, “क्या कहते हो ठाकुर , चलो कुछ धर्म पुण्य तुम भी कमा लो “

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बुधवार, 22 अप्रैल 2020

क्या आप विचारशील पाठक हैं ? पढ़ें .......





ये वो समय है जब आप अपने सारे कार्यों, चिंताओं से दूर रहकर वह कर सकते हैं जो आप जीवन में करना चाहते हैं।

"इस लॉक डाउन के बाद अगर आप पहले से  बेहतर होकर बाहर नहीं निकलते हैं तो इसका मलतब होगा की आपके पास अनुशासन की कमी है , समय की नहीं।": सारथी  

    एक  अनुशासन हीन मनुष्य को उतना ही मिलता है जितना की अनुशासित मनुष्य छोड़ता है। अनुशासन के साथ जीवन के बढ़ते क्रम में "किताबें", आपके दिमाग को विकसित करने का सबसे बेहतरीन तरीका होता है।

चलिए। .....  यहां है कुछ बेहतरीन किताबें हैं जो आप इस समय अपने मोबाइल , लैपटॉप या टैब पर घर बैठे पढ़ सकते हैं।


दस्तावेज़ : मूल्य : 125 
        हिंदी साहित्य के इतिहास निर्माता पूर्वज साहित्यकारों पर समय-समय पर लिखे गए मेरे आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह है। हिंदी साहित्य में कई महान साहित्यकार हैं जिन्हें इन निबंधों में याद किया गया है। इनके अनुभव एवं ज्ञान की खोज खबर मैंने की है। पूर्वज साहित्यकारों की संचित ज्ञान-राशि आज हिंदी साहित्य का अमूल्य धरोहर है।

कोरोना: एक आर्थिक छद्म विश्व युद्ध (Hindi Edition): मूल्य : ₹59 


    अगर आप कोरोना से जुडी जानकारियाँ और जुड़े कुछ खतरनाक पहलुओं के बारे में जानना चाहते हैं तो ये आपके लिए एक बेहतरीन किताब होगी जो आपको आश्चर्यचकित करे देगी। 
    इसमें लेखक, चीन की आगामी रणनीति के बारे में आगाह करता है, जिसके दम पर चीन विश्व क्र्म में खुद को स्थापित करने के सपने देख  रहा है। 

रागदरबारी : मूल्य : 163
    रागदरबारी जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता श्रीलाल शुक्ल हिंदी के वरिष्ठ और विशिष्ट कथाकार हैं। उनकी कलम जिस निस्संग व्यंग्यात्मकता से समकालीन सामाजिक यथार्थ को परत-दर-परत उघाड़ती रही है, पहला पड़ाव उसे और अधिक ऊँचाई सौंपता है। श्रीलाल शुक्ल ने अपने इस नए उपन्यास को राज-मजदूरों, मिस्त्रियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और शिक्षित बेरोजगारों के जीवन पर केेंद्रित किया है और उन्हें एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए एक दिलचस्प कथाफलक की रचना की है।

कीकर और कमेड़ी : मूल्य :99 
    कीकर और कमेड़ी’ सात कहानियों का संग्रह है। हर कहानी अपने आप में एक दुनिया है। इस दुनिया में समलैंगिकता जैसा संवेदनशील मुद्दा भी है और मानव मन की जटिल ऊहापोह भी। लेखिका की सहज और बेबाक अभिव्यक्ति इस किताब को और भी ख़ास बनाती है। पात्रों के दुःख, सुख, उनकी उदासियाँ, उनका प्रेम पाठकों को परिचित सा लगता है।

अलबेला : 79  
    प्रकृति का एक नियम है कि जब भी कोई परिवर्तन होता है, तो इसका असर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सब पर पड़ता है।
हिमयुग में, जब बर्फ पिघल कर, प्रकृति का नया रूप दिखा रही थी, तब मनुष्य के दिमाग की सोयी परतें भी एक-एक कर खुलने लगी।
ये कहानी आदियुग के उसी चरण की अनकही दास्तान है, जिसकी हर घटना के साथ, समय भी अपनी करवट बदलता रहा।
आदिकाल के मनुष्य ने अब जवाब तलाशनें शुरू किये, अपने मस्तिष्क में उफनते अजीबो-गरीब सवालों के।


कोई अन्य किताब जो अपने पढ़ी है और आप अन्य पाठकों को पढ़ने की सिफारिश करते हैं तो हमें कमेंट में बताएं। 





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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

पुस्तक समीक्षा :- दीपक तले उजाला


पुस्तक समीक्षा
कृति:- दीपक तले उजाला
पृष्ठ:-94
मूल्य:-100/-
समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"
*शिक्षक एवम साहित्यकार*
    लखनऊ की कवयित्री उर्मिला श्रीवास्तव की यह आंठवी कृति "दीपक तले उजाला" पढ़ी। इस कृति की सभी कविताएँ मानव को कुछ न कुछ सीख देती है। इस कृति की पहली काव्य रचना चार घड़ी है। यह जीवन क्षण भंगुर है। जीवन कब तक है किसी को पता नहीं। यह सच्चाई हमेशा याद रहे। ये मानव तन मिलना दुर्लभ है। यदि मिला है तो इसमें अच्छे कर्म करें। बदला,अनकही ,खुद सर,36 की गिनती जैसी रचनाओं से श्रीवास्तव ने जीवन की अच्छाइयों को बताने का प्रयास किया है।

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रविवार, 19 अगस्त 2018

पुस्तक समीक्षा - सच , समय और साक्ष्य


पुस्तक समीक्षा - सच , समय और साक्ष्य 
शिवना प्रकाशन , सीहोर ।
मूल्य - 175 ₹ 

कोमलता से चुभन का यथार्थ एहसास कराती हैं शैलेन्द्र की कविताएं 
        
          बैंक प्रबंधक के पद पर रह कर वित्तीय आंकड़ों में उलझते- सुलझते सेवानिवृत हुए प्रेम और मानवीय संवेदनाओं के कुशल चितेरे कवि ,लेखक और विचारक शैलेन्द्र शरण ने अतिव्यस्तता के बावजूद भी अपनी भावनाओं को निरन्तर प्रवाहित होते रहने दिया जो विभिन्न प्रमुख पत्र / पत्रिकाओं के माध्यम से समय समय पर पाठकों तक पहुंचती रही । 

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शनिवार, 18 अगस्त 2018

पुस्तक समीक्षा - " को अहम "

पुस्तक समीक्षा - " को अहम "
लेखक - अशोक जमनानी
प्रकाशक - श्रीरंग प्रकाशन , होशंगाबाद
मूल्य - ₹250 /-

जिज्ञासाओं के समाधान और कर्मपथ की प्रेरणा देता है , उपन्यास - को अहम 
         
         साहित्य के क्षेत्र में नर्मदांचल के युवा रचनाकार अशोक जमनानी अब अनजाना नाम नही है। वे देश के प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में तो प्रमुखता से लिखते ही हैं । अलावा इसके उनकी प्रकाशित कृतियों ने उन्हें वरिष्ठ और सम्माननीय साहित्य सृजकों की श्रेणी में स्वतः ही सम्मिलित कर लिया है। यही उनके प्रभावी लेखन की एक बड़ी विशेषता भी है । 
        लेखन के साथ ही वे नवोदित रचनाकारों के लिए अलग - अलग स्थानों पर जाकर कार्यशालाएं आयोजित कर उन्हें मार्गदर्शन और लेखन की विधियां बतलाते हुए अक्सर दिख जाते हैं । 
       ओजस्वी , प्रभावी और प्रखर वक्ता तो वे हैं ही। सहज , सरल व्यक्तित्व के धनी अशोक जमनानी का उपन्यास " को अहम " इन दिनों चर्चा में है । इससे पहले उनकी अन्य कृतियाँ - बूढी डायरी , व्यास - गादी , छपाक - छपाक , खम्मा , और अमृत वेलो प्रकाशित हो चुकी हैं । यही नही चार खंडों में उनके कहानी संग्रह भी  प्रकाशित हुए हैं । 
       मुझे अभी उनका उपन्यास - " को अहम " मिला है। इस पर लिखना आसान नही है। 
       " को अहम " का अर्थ ही है - कौन हूँ मैं !
        इसे जानना - समझना इतना आसान नहीं । इसकी खोज में ही अनेक ऋषि - मुनि , संत , महात्माओं ने अपना सारा जीवन खपा दिया । 
.....पर क्या सबको इसका सम्यक उत्तर मिल पाया ? 
फिर कोई युवा व्यक्ति यदि इस प्रश्न के उत्तर की लालसा में विचलित हो जाए और अपने कर्तव्य पथ से हटकर इसके समाधान के लिए निकल जाए तो क्या हो ? क्या यह सिर्फ उसका भटकाव होगा या फिर उसे इसका समाधान भी मिलेगा ? 
       जीवन यात्रा या उससे पलायन को जितना सहज - सरल हम समझते हैं । क्या वह वाकई उतनी  ही सहज सरल है  ? क्या कर्म पथ को बीच में ही छोड़कर ,सन्यासी पथ को अपना लेना उचित है ? 
      " को अहम " कहता भी है - सन्यास हर किसी के लिए जिज्ञासा तो हो सकती है पर यह सबका स्वभाव नहीं हो सकता और जब यह जिज्ञासा शांत होती है तो सन्यास भी व्यर्थ ही लगने लगता है। 
          " को अहम " में - माँ नर्मदा के माध्यम से कहीं सांकेतिक तो कहीं स्प्ष्ट तौर पर बड़े ही सरल संवादों तथा घटनाओं के द्वारा , तर्क और श्रद्धा के भंवर में फंसे जीवन से विचलित युवा " सदानंद " का समाधान किया गया है । यह मनःस्थिति किसी भी वैचारिक व्यक्ति की हो सकती है , जिसे सदानंद के माध्यम से सामने लाया गया है। 
     लेखक नेअपनी भूमिका में पात्र के माध्यम से लिखा है -  " नर्मदा का नदी होना या शिवपुत्री होना एक ही बात है , क्योंकि जब नर्मदा शिव पुत्री है तो शिव का विस्तार है और जब नर्मदा नदी है तो शिवत्व का विस्तार है । " सदानंद का यह कथन वैसे तो श्रद्धा और तर्क के मध्य संतुलन स्थापित करता है लेकिन वही सदानंद अपने जीवन में श्रद्धा और तर्क के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाया।
     सदानंद के भीतर का यह संघर्ष ही  - " को अहम " में परिणित होकर हमारे सामने आया है। 
     इस उपन्यास में - प्राकृतिक सौंदर्य है । शैक्षणिक स्थिति में गुरु - शिष्य का सामंजस्य है । ग्रामीण परिवेश की उदारता है। मित्रता का अटूट बंधन है। ममतामयी माँ और पिता का स्नेह है तो युवा शिक्षित पुत्र का वियोग और मिलन भी है। सच्चे प्रेम की सार्थकता है तो उसे अनभिज्ञ स्थिति में भी स्वीकार लेने का विश्वसनीय संदेश भी है। छुआछूत , संकीर्णता और पांडित्य लोभ पर प्रहार है तो जीवन को समर्थ बनाने वाले अनेक सूत्र वाक्य भी हैं । 
      " को अहम " में सच्चे गुरु की महत्ता है तो कथित सन्यासियों द्वारा मात्र चेला बनाने का प्रलोभन भी देखने को मिलता है। इसमें जीवन और सन्यास को रेखांकित करते हुए अनेक जिज्ञासाओं का समाधान है तो अंततः कर्म पथ की श्रेष्ठता की फलित प्रेरणा भी है। 
       यदि कहूँ कि - जब तक आप श्रीरंग जी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास को खुद नहीं पढेंगे , तब तक -  " को अहम " अर्थात कौन हूँ मै ?  का समाधान भी नहीं मिलेगा । जीवन के अनेक अनसुलझे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जायेंगे । 
अशोक जमनानी द्वारा लिखित इस उपन्यास को पढ़ना तो अवश्य चाहिए ही । 
                      - देवेन्द्र सोनी , इटारसी।
                        9111460478


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रविवार, 24 जून 2018

समीक्षा - निबंध को जीवंतता प्रदान करता है पंकज त्रिवेदी का संग्रह - मन कितना वीतरागी



       अहिन्दी भाषी क्षेत्र गुजरात के सुरेंद्र नगर में यदि किसी साहित्यकार और सम्पादक का नाम ससम्मान और प्रमुखता से लिया जाता है तो वे हैं - श्री पंकज त्रिवेदी जी । 
        वे गुजराती बहुल क्षेत्र में हिन्दी का परचम लहराते हुए हिन्दी साहित्य की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली त्रैमासिक पत्रिका विश्वगाथा का प्रकाशन तो करते ही हैं , साथ ही अनवरत सृजन एवं प्रकाशन भी करते हैं । 
        राजस्थान पत्रिका से पत्रकारिता और विभिन्न राष्ट्रीय पत्र - पत्रिकाओं में स्तम्भ लेखन के साथ ही उन्हें कहानी , कविता ,लघुकथा ,निबंध , रेखाचित्र और उपन्यास लेखन में भी प्रवीणता प्राप्त है। अलावा इसके अनेक सम्मानों से सम्मानित श्री त्रिवेदी की रचनाओं का आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी निरंतर प्रसारण होता रहता है। 
       अभी हाल ही में शिक्षाविद श्री पंकज त्रिवेदी का निबंध संग्रह - " मन कितना वीतरागी " मुझे प्राप्त हुआ है। 
      अचंभित हूँ आज के इस दौर में जब निबंध लेखन विधा लगभग गौण होती जा रही है , ऐसे में उनके चिंतनात्मक 130 लघु निबंध पाठकों के मन में आशा जगाते हैं ।

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शनिवार, 9 जून 2018

'बेबस बेटी'



जाती है दुल्हन थापे घृत के मायके में लगाये,ससुराल की दहलीज लांगती है ससुरालीजनों से 
अपनों सी आश लगाये,
होता है जब उसी जगह दुर्व्यवहार उस से तो मायके की प्रीत रह-रह के रुलाये,

पौंछती है नीर सोच के शायद मिले कभी प्यार उनसे जिनसे मैंने ह्रदय के है धीर लगाये,
आज नहीं तो कल हो जायेंगे ये मेरे अपने, हे ! ईश, दिन जल्दी से वो आये,

लाऊँगी मैं अनुराग सभी में इतना कि कोप,कपट गैर की भावना ऐसे जाए 
कि भूले से भी फिर आने की सोच न लाये,

धर्म मेरा,कर्तव्य मेरा, विनोद में सबको जोडूं,ननद-देबर की दूजी माँ, भाभी माँ मैं 
और सास-ससुर मात-पिता से मेरे,
ससुराल का घर मेरा ये प्रेम में हो ऐसे सराबोर कि
 साक्षात कान्हा जी का ये मंदिर बन जाये,

मैं न शब्द कोई मुँह से निकालूंगी चाहे कितने भी घात तन को छलनी कर जाये,
सहूँगी मैं तब तक जब तक प्राण न निकल जाये 
क्यूँकि माँ-पापा ने सिखाया था मुझे कि बेटी, मायके से डोली में विदा हुई 
तू ससुराल से विदाई एक ही बार हो कि अर्थी में तू जाये
 लेकिन कभी न तू ऐसा कुछ करना कि मायके की लाज जाये,

हाँथ जोड़ मैं विनती हूँ करती आपसे(ससुरालीजन) मैं पूरी करूँगी आपकी हर माँग 
अपनी देह को दांव पर लगाये.... पर,
 दहेज की खातिर मुझे जलाकर मेरे मात-पिता को जीते जी ना मारिये,
आपको दहेज देने को मेरी माँ ने अपने जेवर गिरवीं थे 
तब रखवाये और आज भी पूरी कर रहे है माँग आपकी मेरे तात जो अब अपने घर-द्वार चुके हैं लुटाये,

मैं बेटी हूँ किसी लाचार माँ और असहाय बाप की तो आपके घर में भी है एक बेटी 
देख उसका मुख मेरे प्रति भी अपनी भावनाओं को क्यूँ न आप जगाये...?

निर्बल हो चुकी हूँ मैं आज तो और भी ज्यादा 
जिस सुयोग्य वर को ढूंढने में मेरे पिता के पैरों ने काटें खाये 
आज उसी ने मेरी रक्षा में न हाँथ उठाये,

थक-हार चुकी हूँ मैं, अब यातनाओं और याचनाओं से नहीं रुकती है
 गर अब आपकी प्रताड़ना तो बेशक मेरे खात्मे को अब लो कदम उठाये
 मगर अब मैं और नहीं करने दूँगी पिता को अपने दहेज की भरपाई...
लगा दो आग मुझे,मेरे बाद फिर और किसी की बेटी को,
जारी रख इस घटनाक्रम को यूँ कर देना जड़ से खत्म हमें, 
ताकि फिर कोई और ना इस धरा पर बेटी आये,

मात-पिता की चिंता 'एक बेटी' की वजह से उनकी चिता बन जाये 
ऐसी बेटी से तो अच्छा है दुनिया की हर बेटी मर जाये......
अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये अब और ना इस धरा पर कोई बेटी आये।

After a long time, I publish here my poetry...Plz must read...🙏
Ritika(preeti{preet}samadhiya.....
Please Try To Be A Good Human Being...✍

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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

इस हरियाणे मैं, के मरोड़ सै।

खड़ी बोली, अर ऊँची नाक 
दिल का थोड़ा कठोर सै। 
रिडक - झिड़क कै, भिड़कै  मरज्या 
न्यू बाताँ का सा तोड़ सै। 
न्यूए ना बुज्झै कोए 
इस हरियाणे मैं, के मरोड़ सै। 

खाली बस्ते अर फौजी दस्ते 
खेलां का गठजोड़ सै। 
हांस कै बतलाले, तो जान तै  प्यारे 
ना तो, सांसा का भी तोड़ सै। 
न्यूए ना बुज्झै कोए 
इस हरियाणे मैं, के मरोड़ सै। 

धरती खोद सोना उगादे 
काम का पूरा खोर सै। 
चालै  गोली, तो सीना अड़ादे
न्यू , बॉर्डर पै भी शोर सै 
न्यूए ना बुज्झै कोए 
इस हरियाणे मैं, के मरोड़ सै।  

दूध दही ओर टिंडी घी 
पशुधन का जोर सै। 
असली धन तै, युवा म्हारे 
जिनकी, अंतरिक्ष तक दौड़ सै।  
न्यूए ना बुज्झै कोए 
इस हरियाणे मैं, के मरोड़ सै 

     -   सुभाष वर्मा 

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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

लघु कहानी - दादी का प्रेम



         शांतिधाम में दादी की चिता को मुखाग्नि देते हुए रमेश के आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे । उसके पिता भी प्रायश्चित की वेदना में दग्ध होते हुए रमेश के कांधे को सहलाकर उसे सांत्वना दे रहे थे मगर रमेश पर अपने पिता की इस संवेदना का जैसे कोई असर ही नही हो रहा था । वह उन्हें  हिकारत की नजर से देखता और परिक्रमा के लिए आगे बढ़ जाता । श्रद्धाजंलि के पश्च्यात एक एक करके सभी चले गए । रह गए तो सिर्फ पिता और पुत्र । विषाद में डूबे रमेश को कई बार पिता ने घर चलने को कहा पर रमेश टस से मस भी नही हुआ । 
      रोते रोते उसकी आँखे सूज गई थीं । श्मशान की खामोशी और मंद होती चिता की अग्नि ने जब उसे अँधेरे का एहसास कराया तब न चाहते हुए भी रमेश उठा और लड़खड़ाते कदमों से धीरे - धीरे घर लौट आया । रात को बाहर दालान में डली बिछात पर अधमरा सा वह जैसे ही लेटा आसमान में छिटके तारों ने उसकी यादों की पोटली खोल दी । कितनी अलग अलग कहानियां सुनी थी उसने अपनी दादी से इन तारों के बारे में । जितना वह उससे प्रेम करती थीं उतना ही तो इन तारों से भी करती थी। इन्ही तारों में से कोई एक तारा था जो उसके दादाजी थे । दादी कहती थी - मृत्यु के बाद सब तारा बन जाते हैं और हम सबको देखते रहते हैं ।

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गुरुवार, 29 मार्च 2018

लघु कहानी - आत्मबल


         घर के काम काज से निपट कर सुनीता थोड़ा आराम करने के लिए लेटी ही थी कि तभी उसके मोबाइल की घन्टी बजी । सुनीता ने फोन उठाकर देखा तो उसकी सहेली रमा का फोन था । 
         रमा ने बताया अगले सप्ताह साहित्यकारों का तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय आयोजन मुंबई में हो रहा है। अभी - अभी उसका आमंत्रण आया है । लिस्ट में तेरा भी नाम है। आने - जाने का सारा खर्च संस्था ही उठायेगी और मानदेय भी देगी । 
       मैं तो जा रही हूँ। तू भी चलने की तैयारी कर ले । चलेगी न ...। 
       रमा की बात सुनकर , सुनीता निराश हो गई । बुझे मन से बोली - अरे सुनीता । मैं भला कैसे जा सकती हूँ । आज तक कभी स्थानीय आयोजनो के अलावा कहीँ गई नही । एक - दो बार शहर से बाहर गई भी तो सुशील साथ ही गए थे । अब तीन दिन के लिए भला सुशील मेरे साथ कैसे जा सकते हैं । उन्हें छुट्टी ही नही मिलेगी । फिर घर कौन संभालेगा । 
      अरे यार रमा । तू भी कैसी बात करती है । मैं भी तो अकेली जा रही हूँ । मुझे तो मेरे पति कभी मना नही करते । आने जाने से ही सम्पर्क बनते हैं ।

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सोमवार, 26 मार्च 2018

लघु कहानी - पिता का विश्वास

लेखक : देवेन्द्र सोनी

       अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आँखों से अविरल धारा वह रही थी । वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे - आगे चल जरूर रहा था पर उसका मन उसी तेजी से पीछे भाग रहा था।  साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे पर वह जानता था ये आंसू दरअसल उसके मन में चल  रहे प्रायश्चित के आँसू भी हैं । 
      उसे रह रह कर अफ़सोस हो रहा था कि वह अपने पिता के कहे अनुसार क्यों नही चला। क्यों उसने वह सब किया - जिनसे पिता हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे । 
       बेचैन मन लिए वह जैसे तैसे थके कदमों से घर पहुंचा पर अब उसे कोई कुछ बोलने वाला नही था । कोई उसे प्यार और निस्वार्थ भाव से समझाने वाला नही था। वह एकांत में जाकर फिर फूट फूट कर रोने लगा ।     उसे लग रहा था कि - हो न हो , उसका विजातीय विवाह ही पिता की मृत्यु का कारण बना है । अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में शादी की है । एक बार भी उसने पलट कर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नही समझा और शहर से बाहर चला गया । बिना यह सोचे कि उसके बगैर मां पिताजी का क्या हाल होगा । 

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