शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

लेख , जरा हटकर - स्त्री - पुरुष , एक दूसरे के पूरक हैं या प्रतिद्वंदी ?

 स्त्री - पुरुष , एक दूसरे के पूरक हैं या प्रतिद्वंदी । यह एक ऐसा प्रश्न या गम्भीर विषय है - जिसका उत्तर हर एक की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कहीँ यह समानता के रूप में , कहीँ पूरक तो कहीं प्रतिद्वंदी के रूप में देखने को मिलता है । यदि हम पीछे देखें तो पाते हैं सृष्टि में सबसे पहले आदम और हब्बा आए । कैसे आए , कहाँ से आए , यह अनुत्तरित ही है। खैर ! उस समय दोनों ने एक दूसरे की आवश्यक्ता को समझा और सहयोगी बनकर संतति को आगे बढ़ाया । तब दोनों में  एक - दूसरे के लिए पूरक का भाव ही था जो आगे भी सामाजिक व्यवस्था के तहत सहजता और आपसी समन्वय से चलता रहा ।      

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मनचाही पांव की जमीं


कदम रूके नही मेरे
थके नही है हौसले
मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे

सौ बार राह से भटके थे
'सोचा लौट चले' ऐसे भी अटके थे
पर बीच समंदर आ कर के
लौट जाना नादानी है
उम्मीदे फुसफुसायी इसे पार कर ले
कुछ यूँ गिरते हौसले उसने संभाले थे
मनचाही पांव की जमीं 
हम भी पाने को बेताब थे

तेरी जमीं नही इस जहान मे
सबके यही विचार थे
क्यूँ ये जहां रास नही तुझे 
तू उडने चली आसमान मे
फिर मै और मेरा साया मुस्कुराए थे
कुछ यूँ हमने
आशाओ के तार निराशाओ पर गिराए थे
मनचाही पांव की जमीं
हम भी पाने को बेताब थे

तूफां के सिलसिले है जोर पे
सब नाजुक तिनके सा मुझे कहे
उडा के कहाँ ले जाऐंगे
तू अभी सोच भी ये ना सके
मैने लम्बी सांस भरकर कहा
मुझे डर नही है तूफां से
उम्मीद है उडे तो
सही जगह ही जा गिरे
और मनचाही पांव की जमीं
हम ढूढँने निकल पडे

~Anupama

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कोई क्या कहेगा



पूरी जिंदगी 
परवाह करते हैं हम 
इस बात की -
कि - कोई क्या कहेगा !

खो देते हैं इससे 
वे कई पल और खुशियां
जिनसे संवर सकता था
और अधिक 
घर - संसार हमारा ।

इस एक दंश से 
मुरझा जाते हैं , कभी - कभी
बेटे और बेटियों के भविष्य
या कई दफा , सपने भी हमारे।

देखते और सोचते हैं 
अक्सर ही हम , इसी रूप में
इस प्रश्न को
पर मेरी नजर में - होता है ,
एक पहलू और भी इसका।

बचाता है यही डर , बार - बार
अनेक अप्रिय स्थितियों से भी हमको।

सोचें , तो मिलेगा उत्तर यही
सिक्के के दो पहलू की तरह ही है
परिणाम भी इसके ।

कभी बचाता है तो कभी
डुबाता भी है प्रश्न यह - 
कि - कोई क्या कहेगा ? 

समझकर इसे -
लें अपने विवेक का सहारा 
और करें वही - 
जिसके  सुखद हो परिणाम ।

     - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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बुधवार, 1 नवंबर 2017

दिल की बात...





   मेरा एक दोस्त जो दिल्ली से है ,  आज मुझे मिला, उसने मुझे अपनी परेशानी बताइ,वो कहने लगा कि एक छोटे से लालच से मुझे 25,000 रु  गवाने पड़े / बहुत ज्यादा अफसोस हो रहा है / क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा  / आज तक किसी का बुरा नहीं चाहा , किसी को अपशब्द नहीं बोले , सबका भला किया , लेकिन मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ की मुझे नुकसान सहना पड़ा / रब ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया / वो कहने लगा की ताज भाई दिमाग ख़राब हो रहा है,   परेशान सा हो गया हूं /

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जख्म



जरा हटकर - नई कविता

जब जब भी बात होती है
जख्मों पर 
कहा जाता है -
मिले हैं ये
किसी अपनों से ही ।

अक्सर ही मजाक में भी कह देते हैं - 
मिला नही कोई नया जख्म 
हैं कहाँ -अपने !

मगर कभी सोचा है हमने
इन जख्मों के पीछे होते हैं 
कहीँ न कहीं हमारे वे कृत्य 
जिनके प्रति उत्तर को 
ही दे देते हैं हम , नाम 
" अपनों " से मिले जख्मों का। 

कहने से पहले यह - 

करना होगा अवलोकन 
हमको खुद का । 
कहीं - अपनों के दोषी 
हम भी तो नही।



           - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी

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शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

खता हुई ही होगी मुझसे

जरा हटके -  नई कविता
खता हुई ही होगी मुझसे 

अट्ठावन में आते - आते 
लगने लगा है
समा गए हैं मुझमें 
बाबूजी मेरे। 

हो गई है वही चाल - ढ़ाल
झुक गये हैं कंधे , और
स्वभाव में आने लगी है नरमी
हाँ ,संतोष और असंतोष के बीच
बना रहता है द्वंद जरूर
उपजा है जो मानसिक थकान
और वेबजह की निराशा से।

करता हूँ महसूस खुद में उनको
जब आती है खांसी या 
घेरने लगती है तकलीफें वही
जो सहते थे वे अक्सर 
और जिन्हें बताने से कतराते थे
उम्र के अंतिम पड़ाव पर ।

खता हुई ही होगी 
निश्चित ही मुझसे भी 
बरतने की कोताही
किया ही होगा मैने भी 
जाने अनजाने नजरअंदाज उन्हें।

लगता है अब यह सब हरदम ही
क्योंकि , होते हैं वे महसूस मुझे
मेरे अंदर ही।

उम्र का यह अंतिम पड़ाव
सिखाता और याद दिलाता है
बहुत कुछ स्मृति से उनकी।

होती ही है सबसे जिंदगी में
खता भी और रह ही जाती है
कोई न कोई कसर भी सेवा में।

करें याद इन्हें और
दें वह शिक्षा बच्चों को अपने
जिससे न हो कोई गलती
देख रेख में बुजुर्गों की।

मिलेगा इसीसे वह आत्म सुख
जिसकी दरकार है सबको।

      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी

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तू और तेरा किस्सा ही खत्म



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अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी

अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी 
और उसके साथ हमारा पागलपन
तुम जिद किये जाते हो हर बात की 

और हम कुबूल किये जाते है मान उसे हुकुम

कब तक चलेगा ये सिलसिला यूँ ही?

ना तुम जानो हो ना हम
बस चले जा रहे हो तुम अपने जोश में 

और परछाईं जैसे  कदम रखे जा रहे है सँग हम

खुश तुम हो अपनी मर्जियों की पूर्ति पर 

और बेहद खुश है तुम्हारी खुशी में हम
और क्या चाहिये इस जिंदगी से 

कभी-कभी सवाल ये ना करने को करता है मेरा मन

जब तुम मिले चाहने को तो अब 

और कोई ख्वाईश क्यूँ करें इस जीवन से हम
बेशक तुम्हारी जिद्द हूँ मैं पर क्यूँ ना 

हर जन्म तुम पर वार दे ऐसी मुहहोवत करें तुमसे हम।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

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रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो

रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो
मरहम लगाने आते हो या जख्म हरे कर जाते हो
रुकने के लिए नहीं....हो नहीं अब साथ मेरे ये बताने आते हो


ना जाने क्या तुम्हारे मन में समायी हैं 

क्या लेने बार-बार तुम चले आते हों

मुस्कुराने को कहते हो,रुलाने का मौका छोड़ते नहीं
बस तुम्हारा चलता हैं मुझ पर फिर भी खुश कभी तुम हमसे होते नहीं,

बेमुरब्बत,बेदर्दी,बेहया कुछ भी कहते तुमसे बनता नहीं
पता नहीं क्यूँ तुम इस जिस्म में बसे हों जो तुम्हें सुहाता नहीं 
और तुम कभी इसे अपनाते नहीं 

जाते मुझे पूरी तरह छोड़कर नहीं और होकर भी मेरे कभी होते नहीं,
सितमों के तुम बादशाह बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी रहमत बरसाने आते हो,
दर्द के तुम जहाँगीर बन बैठे हो जो मेरे लिये भण्डार भराते हो, 
बहते हुए मेरे खूनी आंसुओं के तुम सरकार बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी सत्ता खड़ी कराते हो

कर्कशता तुम पर कभी मेरी शुरू होना सोचती नहीं,

मधुरता तुम पर कभी मेरी खत्म होना चाहती नहीं दोनों के बीच झूलती हूँ मैं जिसकी ढील तुम बढ़ाते हो और मेरी वफ़ा पर अपनी चालांकि हंसी का ठप्पा लगाते हो ....
मुझे नादान समझने की भूल तुम पहली दफा से आज भी दोहराते हो किसी पल में जाकर ये नहीं सोचते तुम मेरे प्यार के आगे खुद को कितना हारा हुआ पाते हो,
गुम हो अपनी ही धुन में तुम और अपनी ही चलाते हो 
मुझे ठुकरा कर दिल वाली पाने की इच्छा जताते हो....
रोती आखों से अब हँसी तुम पर आती है 
क्या खूब गजब हो तुम जिंदा को मुर्दा बनाकर 
जिंदगी जीयो का डंका बजाते हो।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

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मेरे महबूब तेरी गलियां

मेरे महबूब तेरी गलियां मेरे लिए थी ही नहीं
बहुत ये चाहा मैंने पहुंच सकूँ तुझ तक 

पर तुझ तक पहुंचती राहें मुझे मंजूर करती थी ही नहीं

कैसे न बिखरने देती खुद को मैं जब सबकुछ तुम थे मेरे
पर मेरे नसीब से लड़ने को राजी तेरी चाहत थी ही नहीं


मेरे महबूब ये जो तेरी गलियां थी और ये जो तेरी चाहतों की मनमर्जियां थी

सिर्फ तुझ तक थी मुझ तक तो कभी ये भूल कर भी थी ही नहीं

Written By Ritika(Preeti) Samadhiya.....Please Try To Be A Good Human Being...✍

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रविवार, 15 अक्टूबर 2017

शब्द



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प्रीत चुनरियाँ


सुनो सँवरिया 
तेरी याद में हो गई बावरिया 
बहुत बिताई जुदाई सँग रतियाँ
दर्पण में खुद की परछाईं को तुम मानकर तन्हाई से की जी भर बतियाँ
अनजानी सी सूरत तुम्हारी,अनसुनी सी बोली तुम्हारी
 ना नाम ना पता तुम्हारा फिर भी 
प्रेम के कागज पर ह्रदय की कलम से लिखी तुम्हें ढेरों चिठ्ठियां
और तुम फिर भी बने रहे बहरूपिया 
अब टूटा है सब्र का हर बांध और छूटी है मुझसे मेरी नगरिया
तुम तो हो बड़े ही कठोर और सब्रीले पिया पर
 हमारा ना लागे है अब तुम बिन जियरा 
तुम सँग ही अब भोर और तुम सँग ही अब ये 
साँझ देखेगी मेरे नयनों की उजिरिया 
आ रही हूँ होके प्रेम से सराबोर और ओढ़ मैं प्रीत चुनरियाँ।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being...✍

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शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017



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शनिवार, 16 सितंबर 2017

#माँ


बहुत दुखद है माँ....
तेरी इच्छाओं का मर जाना
इमारत बनाने के लिए
खुद का नींव बन जाना
स्वयं अपने पंख नोंच के 
उन्हें बच्चों को पहनाना
बड़ी बड़ी जरूरतों को हमसे
छिपा के हंसी में छुपाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा आँसू पी जाना
लीपते आँगन में हाथ की 
लकीरो का मिट जाना
चूल्हे की आग में सपनों का
राख हो जाना
हर दर्द को नियति मान कर
तेरा उसे गले लगाना
और फिर मेरी मोहक
मुस्कान में अपनी सारी
तकलीफ़ भूल जाना
बहुत कठिन है माँ.....
तेरा माँ बन जाना
धुँए की ओट में 
तेरा अश्रुओं को छिपाना
प्यार के दो बोल के लिए
पूरा जीवन न्यौछावर कर जाना
घर को घर बनाने के बाद भी 
वो तेरा घर ना कहलाना
बचपन का आँगन छोड़
अनजाने आँगन में बस जाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा पल में जीवन बदल जाना
शिक्षित बच्चों के सामने
खुद का गँवार बन जाना
हर झिड़की पर भी होंठो से
भर भर आशीष देती जाना
आख़री साँस तक बच्चों पर
भरपूर ममता बरसाना
सबकी आँखो में अपने लिए
थोडा सम्मान तलाशना
बहुत दुखद है माँ......
तेरी ममता को ना पहचानना
सब कुछ खो कर भी 
कुछ ना हाथ में आना
सब कुछ दे कर भी
खाली हाथ चले जाना
बहुत दुखद है माँ........
तेरी इच्छाओं का मर जाना........

By: Geetanjali Girwal



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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस



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