मानव जीवन की सबसे बड़ी और अनदेखी पूंजी यदि कोई है तो वह है - हमारा स्वास्थ्य ! अनदेखी इसलिए कहा , क्योंकि हम जब तक हम बिस्तर न पकड़ लें या किसी रोग से गम्भीर रूप से ग्रसित न हो जाएं तब तक , कम से कम अपने स्वास्थ्य की चिंता तो नही ही करते हैं । हां , केवल अपने बच्चों की स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति हम जरूर अधिक जिम्मेदार होते हैं ।
स्वास्थ्य के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है - " तुम गीता का अध्य्यन करने के बजाए फुटवाल के जरिए स्वर्ग के अधिक निकट रहोगे " आशय यह - अपने लक्ष्य ( गोल ) के पीछे दोड़ो मगर अपने स्वास्थ्य को पीछे मत छोड़ो । कितना सही कहा है - स्वामी जी ने। इस संदर्भ में मुझे एक दृष्टांत याद आता है - एक व्यक्ति के मन में नगर सेठ कहलाने का भाव आया और उसने अपने इस विचार को अपना लक्ष्य बना लिया । दिन रात अथक परिश्रम किया और वह नगरसेठ बन भी गया । उसकी वाह वाही होने लगी और वह आदरणीय हो गया लेकिन इस अथक मेहनत के दौरान उसने अपने परिवार और स्वास्थ्य का बिलकुल भी ध्यान नही रखा । हुआ यह कि असमय ही उसका शरीर शिथिल पड़ गया और कई लाइलाज बीमारियों का शिकार होकर अंततः चल बसा। उसकी सारी दौलत भी उसके काम न आ सकी । यदि वह अपने लक्ष्य को सेहत का ध्यान रखते हुए पाता तो क्या वह असमय काल का शिकार होता ? बस अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने के लिए विवेकानन्द जी का वाक्य और यह दृष्टांत ही पर्याप्त है । समय रहते सम्हल जाएँ । जीवन के सारे उद्देश्य पूर्ण करें किन्तु अपने स्वास्थय की अनदेखी न करें क्योंकि हमारे अस्वस्थ्य होने के लिए कोई और नही हम ही जिम्मेदार होते हैं । समझना तो होगा ही इसे।
स्वास्थ्य के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है - " तुम गीता का अध्य्यन करने के बजाए फुटवाल के जरिए स्वर्ग के अधिक निकट रहोगे " आशय यह - अपने लक्ष्य ( गोल ) के पीछे दोड़ो मगर अपने स्वास्थ्य को पीछे मत छोड़ो । कितना सही कहा है - स्वामी जी ने। इस संदर्भ में मुझे एक दृष्टांत याद आता है - एक व्यक्ति के मन में नगर सेठ कहलाने का भाव आया और उसने अपने इस विचार को अपना लक्ष्य बना लिया । दिन रात अथक परिश्रम किया और वह नगरसेठ बन भी गया । उसकी वाह वाही होने लगी और वह आदरणीय हो गया लेकिन इस अथक मेहनत के दौरान उसने अपने परिवार और स्वास्थ्य का बिलकुल भी ध्यान नही रखा । हुआ यह कि असमय ही उसका शरीर शिथिल पड़ गया और कई लाइलाज बीमारियों का शिकार होकर अंततः चल बसा। उसकी सारी दौलत भी उसके काम न आ सकी । यदि वह अपने लक्ष्य को सेहत का ध्यान रखते हुए पाता तो क्या वह असमय काल का शिकार होता ? बस अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने के लिए विवेकानन्द जी का वाक्य और यह दृष्टांत ही पर्याप्त है । समय रहते सम्हल जाएँ । जीवन के सारे उद्देश्य पूर्ण करें किन्तु अपने स्वास्थय की अनदेखी न करें क्योंकि हमारे अस्वस्थ्य होने के लिए कोई और नही हम ही जिम्मेदार होते हैं । समझना तो होगा ही इसे।
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