गुरुवार, 29 मार्च 2018

लघु कहानी - आत्मबल


         घर के काम काज से निपट कर सुनीता थोड़ा आराम करने के लिए लेटी ही थी कि तभी उसके मोबाइल की घन्टी बजी । सुनीता ने फोन उठाकर देखा तो उसकी सहेली रमा का फोन था । 
         रमा ने बताया अगले सप्ताह साहित्यकारों का तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय आयोजन मुंबई में हो रहा है। अभी - अभी उसका आमंत्रण आया है । लिस्ट में तेरा भी नाम है। आने - जाने का सारा खर्च संस्था ही उठायेगी और मानदेय भी देगी । 
       मैं तो जा रही हूँ। तू भी चलने की तैयारी कर ले । चलेगी न ...। 
       रमा की बात सुनकर , सुनीता निराश हो गई । बुझे मन से बोली - अरे सुनीता । मैं भला कैसे जा सकती हूँ । आज तक कभी स्थानीय आयोजनो के अलावा कहीँ गई नही । एक - दो बार शहर से बाहर गई भी तो सुशील साथ ही गए थे । अब तीन दिन के लिए भला सुशील मेरे साथ कैसे जा सकते हैं । उन्हें छुट्टी ही नही मिलेगी । फिर घर कौन संभालेगा । 
      अरे यार रमा । तू भी कैसी बात करती है । मैं भी तो अकेली जा रही हूँ । मुझे तो मेरे पति कभी मना नही करते । आने जाने से ही सम्पर्क बनते हैं ।

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सोमवार, 26 मार्च 2018

लघु कहानी - पिता का विश्वास

लेखक : देवेन्द्र सोनी

       अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आँखों से अविरल धारा वह रही थी । वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे - आगे चल जरूर रहा था पर उसका मन उसी तेजी से पीछे भाग रहा था।  साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे पर वह जानता था ये आंसू दरअसल उसके मन में चल  रहे प्रायश्चित के आँसू भी हैं । 
      उसे रह रह कर अफ़सोस हो रहा था कि वह अपने पिता के कहे अनुसार क्यों नही चला। क्यों उसने वह सब किया - जिनसे पिता हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे । 
       बेचैन मन लिए वह जैसे तैसे थके कदमों से घर पहुंचा पर अब उसे कोई कुछ बोलने वाला नही था । कोई उसे प्यार और निस्वार्थ भाव से समझाने वाला नही था। वह एकांत में जाकर फिर फूट फूट कर रोने लगा ।     उसे लग रहा था कि - हो न हो , उसका विजातीय विवाह ही पिता की मृत्यु का कारण बना है । अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में शादी की है । एक बार भी उसने पलट कर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नही समझा और शहर से बाहर चला गया । बिना यह सोचे कि उसके बगैर मां पिताजी का क्या हाल होगा । 

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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

सहारे

जरा हटके - नई कविता 

जिंदगी में अक्सर हम 
बिना कुछ सोचे - समझे
छोड़ देते हैं अपना ठिया 
किसी सहारे के बल पर ।

लेकिन जब ये सहारे 
निकलते हैं अंदर से 
बलहीन और खोखले , तो -
दोराहे पर होते हैं हम ।

खुलती है जब तक
आँख हमारी 
खा चुके होते हैं हम धोखा
और खो चुके होतें हैं 
गिरकर , सम्हलने का मौका

बिखरना ही फिर -
बन जाता है नियति ।

इसलिए छोड़ने से पहले
अपना ठिया 
परख जरूर लें - 
मिल रहे सहारे को , कि - 
बनाएंगे ये हमको सशक्त 
या कर देंगे निःशक्त ?

      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी


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बुधवार, 21 मार्च 2018

लघु कथा - ह्रदय परिवर्तन

 लघु कथा  - ह्रदय परिवर्तन


           साठ वर्षीय रमा का ह्रदय उस वक्त परिवर्तित हुआ जब उसकी सहेली शारदा ने फोन पर सूचना दी कि - रमा तेरी इकलौती बेटी सुनीता सरकारी अस्पताल में मौत से जूझ रही है , आधा घण्टे के अंदर ही उसने एक के बाद एक तीन कन्याओं को जन्म दिया है और अब वह खुद खतरे में है। सुनीता की ससुराल वाले उसे अस्पताल में मरने के लिए छोड़ कर चले गए हैं । उन्हें तीन बेटियों के जन्म की कोई खुशी नही है। सुरेश भी बेमन से बस अपना पति धर्म ही निभा रहा है। उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नही है। वह उन्हें पालने की स्थिति में नही है। मुझसे पैसे मांग रहा था। मैं अभी अस्पताल से सुनीता को देख कर लौटी हूँ । सुनीता अपने अंतिम समय में बस तुझे ही याद कर रही है , रमा। 
       मेरी मान एक बार मिल आ सुनीता से। तुझे देखते ही शायद वह जी उठे । उसे तेरी मर्जी के खिलाफ शादी करने का बेहद अफ़सोस है। वह माफ़ी मांगना चाहती है तुझसे रमा। क्या अंतिम समय में भी अपनी बेटी को माफ़ नही करेगी - कहकर शारदा ने फोन काट दिया। 

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शुक्रवार, 9 मार्च 2018

ज्ञानी चोर और महकदे


अपनी मंडली के साथ नाच -गाने में मस्त चोरों के सरदार ज्ञानी चोर को अपने ही एक साथी ने कुछ मत्वपूर्ण कार्य की सुचना दी, इशारा पाते ही सभी साथी अपने गुप्त स्थान पर पहुंचे ǀ
-    - क्या बात है जैल सिंह, इतने मायूस ... क्या खबर है ǀ
-    - सरदार ....  मैं पिछले चार दिन से ये सब देख रहा हूँ, रोज संध्या समय नदी किनारे स्नान करते समय मुझे ये तख्ती दिखाई देती है ( तख्ती आगे करते हुए ), पर कुछ समझ नही आया, परन्तु ....
-   -  क्या लिखा है, पढो तो ..... सरदार ने मुछों को ताव देते हुए कहा ǀ 
-   -  लिखा है “ कोई हिन्दू भाई मदद करे, अली महल से आजाद करे: महकदे “ ......... सरदार कोई दुखिया है जो मदद की उम्मीद से हर रोज ये तख्ती लिखती है और पानी में बहा देती है ǀ
-  -   बेचारी है तो दुखिया पर हम इसमें क्या मदद कर सकते हैं, हमें इसे आगे बहा देना चाहिए ताकी सल्तु सुलतान इसे देख सके और मदद कर सके ...... टोली में बेठे एक साथी ने कहा ǀ
-  -   नहीं .... वो हमारी हिन्दू बहन है, हम उसे ऐसे हालत में कैसे छोड़ सकते हैं .... दुसरे ने कहा ǀ
-  -   परन्तु, हजरत सुल्तान अली एक खूंखार राजा है, हम लोग उसका क्या मुकाबला कर सकते हैं, और राजा लोग तो वैसे भी किसी भी महिला को अपने साथ अपनी पटरानी बनाकर रख सकते हैं ǀ .... तीसरे ने कहा
-   -  कोई महिला हमें भाई कहे और अपनी रक्षा की उम्मीद करे, और हम उसे उसके हालात पर छोड़ दें /  हमें उसकी सहायता करनी होगी, किसी भी कीमत पर ..... चोरो के सरदार ज्ञानी ने कहा, मैं कल ही उसकी सहायता के लिए निकलता हूँ ǀ
-   -  मगर सरदार, “राजा के महल सु हम कीमती हीरा चुरा सकत है पर इ .... महकदे ” .... पान चबाते हुए टोली के एक अन्य सदस्य ने कहा ǀ
-    - लोग मुझे ज्ञानी चोर कहते हैं, जो चाँद की चांदनी भी चुरा सकता है ..... सरदार ने मुछों पर ताव देते हुए कहा ǀ
सब लोग अपने अपने कक्ष में चले गये ǀ
अहमद पुर सल्तनत यहाँ से 70 कोस दूर पश्चिम में है, रस्ते में घना जंगल, पैदल का रास्ता भी दो दिन का है, खैर जाना तो है ही ǀ
रात के सन्नाटे में बार - बार किसी धवनि को सुनने की कोशिश में कान लगाये सरदार कुछ सोचने में वय्सत थे ǀ
दूर- दूर तक ज्ञानी चोर के चर्चे थे, अगर किसी कीमती चीज पर नजर रखी जाती तो सिर्फ इसलिए की कहीं ज्ञानी चोर को पसंद न आ जाये, वो चीजों को सिर्फ पसंद नहीं करता बल्कि अधिकार करता था, चाहता नहीं पाता था, भगवान से मांगता नहीं बल्कि समर्पित करता था ǀ
अगली सुबह सरदार विधिवत अपने कार्य के लिए निकल पड़े, गले में मालाओं का ढेर, हाथ में कमंडल, बड़ी - बड़ी दाड़ी, हाथ में लाठी, कंधे पर झोला, साधू के भेस में पश्चिम की और बढ़े जा रहे थे, जहाँ भी जाते, “जय श्री राम” नाम के साथ लोगों से मुलाकात होती, लोग अपना दुःख सुनाते, अपने झोले से कुछ मोती, कीमती जवारात निकाल जरूरत मंद को देते, उन्हें कुछ उपदेश देते और आगे बढ़ जाते ǀ
घने जंगल ने गुजरते गुजरते थक चुके थे, कहीं विश्राम करने की जगह तलाश रहे थे की सामने एक झोंपड़ी दिखाई दि, पास गये तो देखा की दो साधू झगड़ रहे थे ...... तीसरे साधू को देख झेप गये ǀ
-    - गुरु की अनुपस्थिति में आपस में झगड़ना आप ज्ञानी मानुसों को शोभा नहीं देता ǀ
-    - माफ़ करें .... कुछ दिन पहले ही हमारे गुरु सवर्ग सिधार गये .. हम दोनों बस सम्पति के बंटवारे के लिए झगड़ रहे थे ǀ
-    - तुम दोनों आपस में बाँट क्यूँ नही लेते, इतने बड़े ज्ञानी, इतनी मोह माया ..... मेरा यहाँ क्या स्थान .... मुझे जाना चाहिए ..  
-    -  नहीं - नहीं महाराज, हमें माफ़ करें .... आप समझदार है ...आप ही हमारा बंटवारा कीजिये न ǀ
-    -  क्या तुम दोनों को मेरे बंटवारे की सर्त मंजूर होगी ?
-    -  हाँ महाराज ..... दोनों एक साथ बोल उठे ǀ
-   -   ठीक है, जो भी कीमती चीजें तुम्हारे पास है वो सुब मेरे सामने रखो ǀ
-    -  कीमती चीजों में हमारे पास सिर्फ ये तीन चीजें हैं .... एक ने सामने रखते हुए कहा ǀ
-    - ठीक - ठीक बंटवारे के लिए मुझे जानना होगा की इनकी क्या क्या खासियत है, कोन सी वस्तु कितनी अहम् है
-   -   जी महाराज, मैं बताता हूँ ǀ

  • महाराज ये “लाल गुदड़ी” है, कोई भी मनुस्य इसे ओढ़ कर अदृस्य हो सकता है ǀ
  • ये “दोसेर जड़ी’ है, जिसे दोनों तरफ से अलग अलग प्रयोग किया जाता है, इधर से पानी में मिलाकर पीने से कोई भी मनुस्य जानवर बन जाता है और इधर से प्रयोग करने पर फिर से मनुस्य बन जाता है ǀ
  • और ये “केसरिया चादर “ जिस पर बैठ कर कोई भी हवा में उड़ कर किसी भी स्थान पर पहुंच सकता है ǀ

-   -  सुन्दर अति सुन्दर .... आपके गुरु अवस्य ही एक महान ज्ञानी थे, तीनों चीजें अपने अपने महत्व अनुसार बराबर हैं और किसी भी एक के दो हिस्से नहीं किये जा सकते, इसलिए मेरा निर्णय है किसी एक को दो चीजें दि जाये व् दुसरे को सिर्फ एक ǀ
-    - विचार अच्छा है महाराज, मैं पुराना शिष्य हूँ,  इसलिए मुझे दो चीजें लेने का हक है ...एक ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा ǀ
-   -  महराज, क्या बड़े होना ही ज्ञान की परिभासा हैं, मैं मेरे गुरु का प्रिय शिष्य था, इसलिए ......
-    - अगर ऐसा है तो मुझे तुम्हारी परीक्षा लेने होगी,
धनुश उठाया और एक तीर उतर दिशा में और दूसरा पश्चिम दिशा में छोड़ा, तुम दोनों में से जो भी इस तीर को पहले लेकर आएगा उसे दो चीजें मिलेगी और दुसरे को सिर्फ एक ... क्या मंजूर है
दोनों हाँ कहकर दोनों तरफ भागे। 

ज्ञानी चोर, एक चोर था, लोग उसके ज्ञान और चालकी का बखान करते थे, परन्तु इस समय वो एक साधू था। 
            ..... जारी   



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हिंदी लेखक: शायरी

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शनिवार, 13 जनवरी 2018

शीर्ष 10 नए हिंदी उपन्यास

#1  बनारस टॉकीज 



बनारस टॉकीज़ साल 2015 का सबसे ज़्यादा चर्चित हिंदी उपन्यास है। साल 2016 और 2017 में भी ख़ूब पढ़े जाने का बल बनाए हुए है। सत्य व्यास का लिखा यह उपन्यास काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के छात्रावासीय जीवन का जो रेखाचित्र खींचता है वो हिंदी उपन्यास लेखन में पहले कभी देखने को नहीं मिला। इस किताब की भाषा में वही औघड़पन तथा बनरासपन है जो इस शहर के जीवन में। सत्य व्यास 'नई वाली हिंदी’ के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं।

#2 दिल्ली दरबार 



दिल्ली दरबार छोटे शहरों के युवाओं के दिल्ली प्रवास, प्रेम, प्रयास और परेशानियों की एक प्रहसनात्मक कहानी है। यह लापरवाह इश्क से जिम्मेदार प्रेम की परिणति तक की एक खुशहाल यात्रा है। यह कहानी दरअसल उन लाखों युवाओं के जीवनशैली की भी है जो बेहतर जिंदगी और भविष्य की संभावनाओं के लिए दिल्ली जैसे महानगर का रास्ता लेते हैं। मनोरंजक ढंग से कही गई इस कहानी के केंद्र में टेक्नो गीक 'राहुल मिश्रा' है; जिसका मंत्र है 'सफलता का हमेशा एक छोटा रास्ता है' और विडंबना यह है कि वह इस बात को अपने ही सनकी तरीके से सही साबित भी करता जाता है।कहानी परिधि की भी है जो पूर्वी दिल्ली की एक ठेठ लड़की है और राहुल को लेकर भविष्य तलाश रही है। मूलतः ‘दिल्ली दरबार’ दिल्ली की नहीं, बल्कि दिल्ली में कहानी है जो चलते-चलते प्रेम, विश्वास, दोस्ती और 'जीवन' के अर्थ खोजती जाती है।

#3 मसाला चाय 



Lekhak: Divya Prakash Dubey 

मसाला चाय’ की कहानियाँ आपकी ज़िन्दगी जैसी हैं। कभी थोड़ा ख़ुश, कभी थोड़ा उदास तो कभी दोस्तों के साथ ख़ुशियों जैसे तो कभी सबसे नज़र बचाकर आँसू बहाती हुईं। मसाला चाय को पढ़ना ऐसे ही है जैसे अपने कॉलेज की कैंटीन में सालों बाद जाकर दोस्तों के साथ चाय पीते हुए गप्पे मारना। अगर आप हिन्दी पढ़ना शुरू करना चाहते हैं तो यह किताब आपकी पहली किताब हो सकती है। बिल्कुल बोलचाल की भाषा में लिखी हुई किताब। आपको पढ़ते हुए ऐसा लगेगा जैसे लेखक जैसे लेखक कहानियाँ पढ़कर सुना रहा है। वैधानिक चेतावनी: मसाला चाय जिसको अच्छी लगती है उसको उसको बहुत अच्छी लगती है जिसको बुरी उसको बहुत बुरी।

#4 यूपी 65 




बेस्ट सेलिंग किताबों ‘नमक स्वादानुसार’ और ‘ज़िंदगी आइस पाइस’ के लेखक निखिल सचान का पहला उपन्यास। उपन्यास की पृष्ठभूमि में आइआइटी बीएचयू (IIT BHU) और बनारस है, वहाँ की मस्ती है, बीएचयू के विद्यार्थी, अध्यापक और उनका औघड़पन है। समकालीन परिवेश में बुनी कथा एक इंजीनियर के इश्क़, शिक्षा-व्यवस्था से उसके मोहभंग और अपनी राह ख़ुद बनाने का ताना-बाना बुनती है। यह हिंदी में बिलकुल नये तेवर का उपन्यास है, जो आपको अपनी ज़िंदगी के सबसे सुंदर सालों में वापस ले जाएगा, आपको आपके भीतर के बनारस से मिलाएगा। इस उम्मीद में कि बनारस हम सबके भीतर बना रहे, हम अलमस्त, औघड़ रहें और बे-इंतहा हँस सकें।

#5 नमक स्वादानुसार 


नमक स्वदंसुष बचपन की कल्पनाओं से लेकर मानव अस्तित्व के अंधेरे की खोज करने वाली कहानियों का संग्रह, कहानियां जो आपको उदासीन कर देगा, वह आपकी कहानी बताएगा, जो आपको और उनको झटका देगा, जो आपको अपने पसंदीदा स्थानों पर ले जाएगा।

#6 जिंदगी आस पास 



लघु कथा संग्रह, निखिल की दूसरी पुस्तक है, जिसने अपनी पहली पुस्तक 'नमक स्वदानुसार' की उल्लेखनीय सफलता के बाद किया है। इस पुस्तक में, निखिल अपने पाठकों को एक ऐसी यात्रा के लिए ले जा रही है जो बुनियादी मानव अस्तित्व की पहेलियों को हल करने की कोशिश करता है

#7 बनारस वाला इश्क़ 



किताब 'बनारस वाला इश्क' दो अलग-अलग विचारधाराओं से आ रही एक जोड़ी के बारे में है- जयश्री राम और लाल सलाम। लेखक महाविद्यालय की राजनीति के चारों ओर की कहानी और प्रेम के साथ-साथ कष्टों में खिलते हैं। मुख्य पात्रों के माध्यम से बबून मिश्रा बिहार के गया जिला और उना ठाकुरैन बैठक के आसपास बनारस के सोनल सिंह से टकराव और जुदाई दिखाए गए हैं। कहानी के लेखक प्रभात बांधतल्या बिहार से हैं और किताब, इसलिए, बिहारी माटी को प्रतिबिंबित करती है।

#8 बकर पुराण 



'बकर पुराण' उन सभी स्नातक लड़कों का एक आधुनिक दिन है जो अपने घरों को बेहतर भविष्य की अपेक्षा के लिए छोड़ देते हैं और बंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहते हैं, केवल शहरों को अपने घर बनाने के लिए। यह किताब उन सभी लोगों को समर्पित है, जो एक बार प्यार में गिर गईं, बेवकूफ काम करती हैं और पड़ोस के चाय-स्टालों पर चाय के कप पर देश के विदेशी मामलों पर चर्चा करने में कभी नाकाम रही हैं। स्पष्ट और सटीक शब्दों में लिखा हुआ और फैंसी नहीं, यह पुस्तक पिछले, भविष्य और इस स्नातक की उपस्थिति पर प्रकाश डाला जाता है जिसका जीवन हमेशा के लिए समान होगा।

#9 डोमनिक की वापसी 



विवेक मिश्र के इस उपन्यास के केंद्र में एक नाटक है- 'डॉमनिक की वापसी'। इस नाटक के मुख्य किरदार 'डॉमनिक' की भूमिका निभाने वाला अभिनेता है दीपांश जो नियति और यथार्थ के बीच झूलता अपना सफ़र तय करता आगे बढ़ता है और उस समय रंगमंच की दुनिया छोड़ कर दृश्य से गायब हो जाता है जब एक अभिनेता के रूप में वह वो मक़ाम हासिल कर चुका होता है जो उस दुनिया किसी भी कलाकार के लिए एक सपना होता है। यह उपन्यास जीवन में अभिनय और अभिनय में जीवन के दो किनारों के बीच अतीत, वर्तमान और भविष्य के कई किस्सों में झांकता हुआ आगे बढ़ता है। कथानक में प्रेम पर केंद्रित नाटक सफल होता है पर नाटक के बाहर जीवन में प्रेम छीजता और चुकता जाता है। विवेक मिश्र के लेखन में सघन जीवनानुभव, पुख्ता अध्यन और विषय में गहरी संलग्नता स्पष्ट दिखाई देती है। यह उपन्यास भी प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन को समझता, समझाता आगे बढ़ता है। उपन्यास न केवल अपने कथानक में अनूठा है बल्कि भाषा, शैली और कहन के भी कई प्रयोगों के अपने में समेटे एक नए प्रकार का शिल्प गढ़ता दिखाई देता है। यह उपन्यास न केवल हमें वर्तमान लेखन के प्रति आश्वस्त करता है बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद भी जगाता है। विवेक की ही भाषा में कहें तो 'अच्छे समय में कलाएं हममें और बुरे समय में हम कलाओं में जीते हैं'। यह उपन्यास निर्णायकों द्वारा देश भर से 50से ऊपर आई पांडुलिपियों में से एक 'आर्य स्मृति सम्मान' के लिए चुना गया है। आशा है यह न केवल विवेक मिश्र के लेखन में बल्कि हिंदी उपन्यास विधा में भी एक मील का पत्थर साबित होगा।

#10 मुसाफिर कैफ़े 



हम सभी की जिंदगी में एक लिस्ट होती है। हमारे सपनों की लिस्ट, छोटी-मोटी खुशियों की लिस्ट। सुधा की जिंदगी में भी एक ऐसी ही लिस्ट थी। हम सभी अपनी सपनों की लिस्ट को पूरा करते-करते लाइफ गुज़ार देते हैं। जब सुधा अपनी लिस्ट पूरी करते हुए लाइफ़ की तरफ़ पहुँच रही थी तब तक चंदर 30 साल का होने तक वो सबकुछ कर चुका था जो कर लेना चाहिए था। तीन बार प्यार कर चुका था, एक बार वो सच्चा वाला, एक बार टाइम पास वाला और एक बार लिव-इन वाला। वो एक पर्फेक्ट लाइफ चाहता था।

मुसाफिर Cafe कहानी है सुधा की, चंदर की, उन सारे लोगों की जो अपनी विश लिस्ट पूरी करते हुए perfect लाइफ खोजने के लिए भटक रहे हैं।



पढ़िए : सर्वश्रेष्ठ 5 प्रेरणादायक किताबे जो आपकी जिंदगी को बदल देगी


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सर्वश्रेष्ठ 5 प्रेरणादायक किताबे जो आपकी जिंदगी को बदल देगी

#  1 अपनी एकाग्रता कैसे बढ़ाएं 
प्राचीनकाल से ही भारतीय शैक्षिक प्रक्रियाओं में एकाग्रता-विकास को बहुत महत्त्व दिया गया। आश्रमों में आचार्य अपने शिष्यों को विविध योगाभ्यासों के जरिए एकाग्रता के गुर सिखाते थे। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली में एकाग्रता-विकास के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष की पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई है। हमने बच्चों के ऊपर सूचनाओं का बोझ बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
   
Lekhak: Vijay Prakash
नतीजतन बच्चों की उपलब्धि का स्तर नीचे आ गया है और वे महज रट्टू तोते बनकर रह गए हें। यदि हमें रटंत विद्या को छोड़कर सृजनवादी शिक्षा को प्रोत्साहित करना है तो यह आवश्यक है कि हम नवाचारी ढंग से सोचें। एकाग्रता-विकास में ही सृजनवादी शिक्षा की कुंजी है। बिना एकाग्रता के हम किसी कार्य में सफल नहीं हो सकते।

#2  विचारों की शक्ति और सफलता 


      लेखक: सत्य नारायण & R.K.Mittal (Retired I.A.S.)

#3  मेरी किताब मेरी दोस्त 

     लेखक : Sharma Vidushi

यह किताब आपको सफ़लता पाने के कोई जादुई मंत्रा नहीं बताती, ना ही यह किताब आपके जीवन की सब परेशानियों को हल करने का दावा करती है। लेकिन आप इस पुस्तक के पन्नों में एक सच्चा दोस्त पाएँगें, एक ऐसा दोस्त जो आप की मुश्किलें समझता है तथा उन मुश्किलों को हल करने के लिए आप को प्रेरित भी करता है, और सलाह भी देता है।

# 4 सफलता के कदम कैसे लें ?

     लेखक : Rakesh Nath 


# 5 ऊँची उड़ान ही लक्ष्य है 

यदि ऊँची उड़ान आपका लक्ष्य है तो अपनी योजना में शामिल करिए— हौसला, पंख और आँखें। हौसला, जो आपको ऊँची-से-ऊँची उड़ान भरने के लिए प्रेरित करे; पंख, जो आपको थकने न दे; आँखें, जिनमें तड़प हो नए आकाश को देखने की! ऊँची उड़ान का आनंद वही ले सकता है, जिसने किसी जगह विशेष को लक्ष्य बनाने की बजाय ऊँची उड़ान को ही लक्ष्य बना लिया है।

     लेखक: Dilip Trivedi, Shivendra Singh

 यदि लक्ष्य की प्राप्ति एक सुखद क्षण है, तो ऊँची उड़ान को लक्ष्य बनानेवाले पंखों को हर क्षण एक सुखद अनुभूति हो रही है। खुला आसमान, चौड़े पंख और लक्ष्य पर नजर रखते हुए हर पल लक्ष्य प्राप्ति सुखानुभूति की पराकाष्ठा है। लक्ष्य को प्राप्त करना तो वास्तव में एक क्षण की उपलब्धि है, लेकिन इसको प्राप्त करने की यात्रा हर क्षण एक उपलब्धि है। यह जीवन को सकारात्मक नजरिए से देखने की एक बानगी मात्र है, जिसे स्वीकार करते ही आप ऊँची उड़ान के रास्ते में आनेवाली हर बाधा से नई ऊर्जा प्राप्त करेंगे और सारी नकारात्मकता बहुत पीछे छूट जाएगी; शेष बचेगा— उत्साह, शांति और लगातार मिलनेवाला सृजनात्मक संतोष!



हमें लगातार अपनी असफलता और गलतियों से सीखते रहना चाहिये।
तभी हम जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल कर सफलता की तरफ कदम बढ़ा सकते है।

पढ़िए : शीर्ष 10 नए हिंदी उपन्यास




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अधुरापन



जिंदगी में एक अधूरापन तब आता है जब हमें ये कहने का बहाना मिलता है की "मुझे तो मौका ही नहीं मिला" और फिर उन अधूरे सपनों को किसी ऐसे पर थोप दिया जाता है जिससे हमें बहुत उमीदें हो. ...... उसके सपनों को बिना जाने , बिना पहचाने ..उसकी जिंदगी में भी एक नया अधूरापन भर देते हैं।

सुधरे हुए समाज में रहने का दावा करने वाले संजीव श्रीवास्तव की बेटी ने जब 12 वी पास की, तो वो उमीदों का पहाड़ सर पर उठाए, जमीं पर पैर नहीं रख रहे थे।

- ये लो पिताजी, मिठाई खाओ, आपकी पोती ने टॉप किया है..... संजीव ने अपने पिता से खुश होते हुए कहा
- हाँ, बेटी ब्याहने लायक हो गयी है न अब तो .....हमेशा खामोश रहने वाले आरती के दादा जी ने अपनी जुबान से भयंकर बाण छोड़ते हुए कहा।
- अरे पिताजी, आरती ने 94% के साथ पुरे जिले में सबसे आगे रही है।
शाबाश  शाबाश .....  दादा जी ने हाँ में हाँ मिलते हुए कहा।
घर में खुशियों का माहौल था, लोग बधाई देने आ रहे थे, ऐसे में आरती भी शॉपिंग करने चली गयी ...
- आरती ये क्या है, मैंने तुम्हे मना किया था न की, ये सब मत खरीदना, कितने छोटे कपड़े हैं ये ......गावों में ये सब   ...  मां ने हमेशा की तरह फिर से टोका।
- क्या तुम भी, तुम अनपढ़ की अनपढ़ ही रहोगी, ये मेरी बेटी है ..पढ़-लिख कर डॉ. बनेगी...और तुम छोटी-छोटी बातों पर.... पापा ने कहा।
अपना शौक अब पूरा नहीं करेगी तो कब करेगी.... लोग सिर्फ सवाल करते हैं...... उनसे उलझने की जरूरत नहीं है।

हर बार पापा का सानिध्य पाकर आरती अपने-आपको खुशनसीब समझती।

- पापा जब तक आगे की पढ़ाई शुरू नहीं होती मैं, पेंटिंग ( चित्रकारी ) सीख लेती हूं।
- हाँ हाँ क्यों नहीं बेटा .....छुटियाँ है अपना शौक पूरा करो ...  कम से कम अब मेरे चेहरे का भूत तो नहीं बनाएगी .....संजीव ने अपनी बेटी को हंस कर कहा।

आरती के बचपन का शौक, जीवन का नया पड़ाव और सपनों की धुन एक नई उड़ान भरने को तैयार थे

बाहरवीं के बाद आरती का दिल्ली विश्विद्यालय में दाखिला हुआ  तो सपनों को मानो पंख लग गए।

इस बार भी स्कूल में टॉप करने वाली आरती, कॉलेज में हमेशा आगे रहती, कोई दोस्त नहीं, सिर्फ पढ़ाई ..आज तक यही तो सीखा था उसने।
फिर एक दिन सब से जान- पहचान  हुई  ...  जब साल अंत में हुए पेंटिंग कम्पीटीशन में आरती ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

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शनिवार, 6 जनवरी 2018

स्वास्थ्य के प्रति कितने जिम्मेदार हम

     मानव जीवन की सबसे बड़ी और अनदेखी पूंजी यदि कोई है तो वह है - हमारा स्वास्थ्य ! अनदेखी इसलिए कहा , क्योंकि हम जब तक हम  बिस्तर न पकड़ लें या किसी रोग से गम्भीर रूप से ग्रसित न हो जाएं तब तक , कम से कम अपने स्वास्थ्य की चिंता तो नही ही करते हैं । हां , केवल अपने बच्चों की स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति हम जरूर अधिक जिम्मेदार होते हैं ।     
स्वास्थ्य के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है - " तुम गीता का अध्य्यन करने के बजाए फुटवाल के जरिए स्वर्ग के अधिक निकट रहोगे " आशय यह - अपने लक्ष्य ( गोल ) के पीछे दोड़ो मगर अपने स्वास्थ्य को पीछे मत छोड़ो । कितना सही कहा है - स्वामी जी ने। इस संदर्भ में मुझे एक दृष्टांत याद आता है - एक व्यक्ति के मन में नगर सेठ कहलाने का भाव आया और उसने अपने इस विचार को अपना लक्ष्य बना लिया । दिन रात अथक परिश्रम किया और वह नगरसेठ बन भी गया । उसकी वाह वाही होने लगी और वह आदरणीय हो गया लेकिन इस अथक मेहनत के दौरान उसने अपने परिवार और स्वास्थ्य का बिलकुल भी ध्यान नही रखा । हुआ यह कि असमय ही उसका शरीर शिथिल पड़ गया और कई लाइलाज बीमारियों का शिकार होकर अंततः चल बसा। उसकी सारी दौलत भी उसके काम न आ सकी । यदि वह अपने लक्ष्य को सेहत का ध्यान रखते हुए पाता तो क्या वह असमय काल का शिकार होता ? बस अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने के लिए विवेकानन्द जी का वाक्य और यह दृष्टांत ही पर्याप्त है । समय रहते सम्हल जाएँ । जीवन के सारे उद्देश्य पूर्ण करें किन्तु अपने स्वास्थय की अनदेखी न करें क्योंकि हमारे अस्वस्थ्य होने के लिए कोई और नही हम ही जिम्मेदार होते हैं । समझना तो होगा ही इसे। 

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शनिवार, 16 दिसंबर 2017

जरा हटकर - छवि


रोज ही देखता हूँ , मैं
दर्पण में अपनी बदलती हुई छवि


पल पल बदलते रहना ही
खासियत होती है इसकी
जो क्रमशः इठलाती हुई 
बढ़ती है शिखर की ओर,
और फिर अचानक से शिथिल हो
लुढ़कने लगती है वहां से 
कराते हुए यह एहसास, कि
नहीं रह सकता कोई 
शिखर पर आजीवन।


लुढ़कते हुए ही आना होता है उसे 
फिर जमीं पर ।

छवि कहती है - 
देखो मुझे नित्य ही 
और सीखो यह -
धरा पर आए हो 
सिर्फ धरा के लिए। 


फिर ये गुमान , कैसा ?

       - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

लेख - अनावश्यक हस्तक्षेप से बिखरते रिश्ते

           
        वर्तमान समय में रिश्तों में बिगाड़ और बिखराव एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है। बात बात पर रिश्ते बिगड़ जाना और फिर आपस में संवाद हीनता का पसर जाना रिश्तों को कहीँ दूर तक बिखरा देता है,जिन्हें फिर से समेटना मुश्किल हो जाता है। घर , परिवार , समाज या अन्य रिश्ते नातों में निरन्तर आ रहे बिखराव की आखिर वजह क्या है ? जाहिर है इस प्रश्न के उत्तर में कोई एक कारण नही हो सकता । हर रिश्तों में अलग अलग कारण और परिस्थितियां होती हैं । जिन्हें समय रहते समझना जरूरी होता है। रिश्ते यदि किसी अनावश्यक हस्तक्षेप की वजह से बिखरते हैं तो अक्सर किसी के हस्तक्षेप से ही सुधरते भी हैं । इसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए ।

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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

लेख - "कवि रघुवीर सहाय"

हिंदी साहित्य के विलक्षण कवि
       

 - "कवि रघुवीर सहाय"

संदर्भ :- 9 दिसंबर जन्म दिवस
    राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

    दूसरा सप्तक के कवियों में प्रमुख नाम रघुवीर सहाय का आता है। हिंदी के विलक्षण कवि,लेखक,पत्रकार,संपादक,अनुवादक,कथाकार,आलोचक।रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर1929 को लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुआ था।इन्होंने 1951 में अंगेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। 1946 से साहित्य सृजन करना प्रारंभ किया। इनका विवाह 1955 में विमलेश्वरी सहाय से हुआ। 
             इनकी प्रमुख कृतियाँ 'सीढ़ियों पर धूप में','आत्म हत्या के विरुद्ध','हँसो हँसो जल्दी हँसो','लोग भूल गए हैं','कुछ पते कुछ चिट्ठियां','एक समय था' जैसे कुल छह काव्य संग्रह लिखे। 'रास्ता इधर से है'(कहानी संग्रह),'दिल्ली मेरा परदेश' और 'लिखने का कारण'(निबन्ध संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ है।
रघुवीर सहाय हिंदी के साहित्यकार के साथ साथ एक अच्छे पत्रकार थे,उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत लखनऊ से प्रकाशित दैनिक नवजीवन में 1949 से की। 1951 के आरंभ तक उप संपादक और सांस्कृतिक संवादाता रहे,उसके बाद 1951-1952 तक दिल्ली में "प्रतीक" के सहायक संपादक रहे। 1953-1957 तक आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक रहे।
                     रघुवीर सहाय की 'बारह हंगरी कहानियां' राख और हीरे शीर्षक से हिंदी भाषान्तर भी समय समय और प्रकाशित हुए। उनकी कविताओं के भाषा और शिल्प  में पत्रकारिता का तेवर दृष्टिगत होता है। तीस वर्षों तक हिंदी साहित्य में अपनी कविताओं के लिए रघुवीर सहाय शीर्ष पर रहे। समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण स्तम्भ रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में 1960 के बाद की हमारी देश की तस्वीर को समग्रता से प्रस्तुत करने का काम किया। उनकी कविताओं में नए मानवीय सम्बन्धो की खोज देखी जा सकती है। वे चाहते थे कि समाज में अन्याय और गुलामी न हो तथा ऐसी जनतांत्रित व्यवस्था निर्मित हो जिसमें शोषण,अन्याय,हत्या,आत्महत्या,विषमता,दास्तां, राजनीतिक संप्रभुता,जाती धर्म में बंटे समाज के लिए कोई जगह न हो।
      वे चाहते थे किआजादी की लड़ाई जिन आशाओं और सपनों से लड़ीं गयी है उन्हें साकार करने में यदि बाधाएं आती है तो उनका विरोध करना चाहिए। उन्होंने उनकी रचनाओं का विरोध भी किया।
                 1984 में रघुवीर सहाय को कविता संग्रह (लोग भूल गए है) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी का कविताओं में आम आदमी को हांशिये पर धकेलने की व्यथा साफ दिखाई देती है। उनकी कविता की कुछ पंक्तियां देखिये:-
      *जितनी बूंदे 
      उतने जो के दाने होंगे
      इस आशा में चुपचाप गांव यह भीग रहा है
1982-1990 तक इन्होंने स्वतन्त्र लेखन किया। 'वे तमाम संघर्ष जो मैंने नही किये अपना हिसाब मांगने चले आते है' ऐसी पंक्तियां रचने वाले रघुवीर सहाय जन मानस में एक दीर्घजीवी कवि थे जिनकी कविताये स्वतन्त्र भारत के निम्न मध्यम वर्गीय लोगो की पीड़ा को दर्शाती है। नई कविता के दौर में रघुवीर सहाय का नाम एक बड़े कद के कवि के रूप में स्थापित हुआ था। 1953 में रघुवीर सहाय एक छोटी सी कविता लिखते है-
   *वही आदर्श मौसम
   और मन में कुछ टूटता सा
   अनुभव से जानता हूं कि यह बसन्त है*
रघुवीर सहाय की अधिकांश कविताये विचारात्मक और गद्यात्मक है। वे कहते थे 'कविता तभी होती है जब विषय से दूर यथार्थ के निकट होती है'। रघुवीर सहाय भाषा सजक रहे है। उनकी भाषा बोल चाल की भाषा है। आदमी की भाषा में छिपे आवेश को बनाने का प्रयास रघुवीर सहाय करते थे।
    भारत में आदमी की समस्याओं और विरोधी व्यवस्था में राजनीति तथा जीवन के परस्पर सम्बन्ध को बचाये रखने का प्रयास उनकी कविताओं में दिखाई देता है।
   -98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी,भवानीमंडी, पिन- 326502,
जिला-झालावाड़
राजस्थान


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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

लेख - लोग क्या कहेंगे ?

लोग क्या कहेंगे?
       परिदृश्य चाहे वैश्विक हो , राष्ट्रीय हो , सामाजिक हो या पारिवारिक हो - कुछ भी करने से पहले यह प्रश्न हमेशा सालता है कि - लोग क्या कहेंगे ? उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी और इसका हमारे मूल्यों , सिद्धान्तों और जीवन पर क्या असर पड़ेगा ! चिन्तन का पहलू यह होना चाहिए -  हमको लोगों के कहने की कितनी परवाह करना चाहिए क्योंकि आप यदि अपने नजरिये से अच्छा भी करते हैं तो जरूरी नही कि वह अन्य व्यक्तियों की नजर में भी अच्छा ही हो । सबका नजरिया अलग अलग होता है । फिर , लोगों का तो काम ही है कहना ! 
     यहां मुझे एक बोध कथा याद आ रही है  -  एक पिता पुत्र ने मेले से खच्चर खरीदा और उसे लेकर घर की ओर निकले । रास्ते में किसी ने कहा - कैसा पिता है , खच्चर होते हुए भी बेटे को पैदल ले जा रहा है । पिता को भी लगा तो उसने अपने बेटे को खच्चर पर बैठा दिया और खुद पैदल चलने लगा । आगे चलने पर किसी ने कहा - कैसा बेटा है , बूढ़ा बाप पैदल चल रहा और जवान बेटा शान से सवारी कर रहा। अब दोनों ही खच्चर पर बैठ गए तो फिर किसी ने कहा - क्या लोग हैं , मरियल से खच्चर पर बैठकर जा रहे , खच्चर का जरा ध्यान नही ! 
      इस सन्दर्भ का तातपर्य सिर्फ इतना ही बताना है कि आप कुछ भी करें - लोग तो कहेंगे ही । निर्णय आपको करना है कि आप उसे कितनी तबज्जो देते हैं।


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