बुधवार, 1 नवंबर 2017

दिल की बात...





   मेरा एक दोस्त जो दिल्ली से है ,  आज मुझे मिला, उसने मुझे अपनी परेशानी बताइ,वो कहने लगा कि एक छोटे से लालच से मुझे 25,000 रु  गवाने पड़े / बहुत ज्यादा अफसोस हो रहा है / क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा  / आज तक किसी का बुरा नहीं चाहा , किसी को अपशब्द नहीं बोले , सबका भला किया , लेकिन मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ की मुझे नुकसान सहना पड़ा / रब ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया / वो कहने लगा की ताज भाई दिमाग ख़राब हो रहा है,   परेशान सा हो गया हूं /

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

जख्म



जरा हटकर - नई कविता

जब जब भी बात होती है
जख्मों पर 
कहा जाता है -
मिले हैं ये
किसी अपनों से ही ।

अक्सर ही मजाक में भी कह देते हैं - 
मिला नही कोई नया जख्म 
हैं कहाँ -अपने !

मगर कभी सोचा है हमने
इन जख्मों के पीछे होते हैं 
कहीँ न कहीं हमारे वे कृत्य 
जिनके प्रति उत्तर को 
ही दे देते हैं हम , नाम 
" अपनों " से मिले जख्मों का। 

कहने से पहले यह - 

करना होगा अवलोकन 
हमको खुद का । 
कहीं - अपनों के दोषी 
हम भी तो नही।



           - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

खता हुई ही होगी मुझसे

जरा हटके -  नई कविता
खता हुई ही होगी मुझसे 

अट्ठावन में आते - आते 
लगने लगा है
समा गए हैं मुझमें 
बाबूजी मेरे। 

हो गई है वही चाल - ढ़ाल
झुक गये हैं कंधे , और
स्वभाव में आने लगी है नरमी
हाँ ,संतोष और असंतोष के बीच
बना रहता है द्वंद जरूर
उपजा है जो मानसिक थकान
और वेबजह की निराशा से।

करता हूँ महसूस खुद में उनको
जब आती है खांसी या 
घेरने लगती है तकलीफें वही
जो सहते थे वे अक्सर 
और जिन्हें बताने से कतराते थे
उम्र के अंतिम पड़ाव पर ।

खता हुई ही होगी 
निश्चित ही मुझसे भी 
बरतने की कोताही
किया ही होगा मैने भी 
जाने अनजाने नजरअंदाज उन्हें।

लगता है अब यह सब हरदम ही
क्योंकि , होते हैं वे महसूस मुझे
मेरे अंदर ही।

उम्र का यह अंतिम पड़ाव
सिखाता और याद दिलाता है
बहुत कुछ स्मृति से उनकी।

होती ही है सबसे जिंदगी में
खता भी और रह ही जाती है
कोई न कोई कसर भी सेवा में।

करें याद इन्हें और
दें वह शिक्षा बच्चों को अपने
जिससे न हो कोई गलती
देख रेख में बुजुर्गों की।

मिलेगा इसीसे वह आत्म सुख
जिसकी दरकार है सबको।

      - देवेंन्द्र सोनी , इटारसी

Attachments area

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

तू और तेरा किस्सा ही खत्म



Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी

अजीब सी मुहहोवत है ना तुम्हारी 
और उसके साथ हमारा पागलपन
तुम जिद किये जाते हो हर बात की 

और हम कुबूल किये जाते है मान उसे हुकुम

कब तक चलेगा ये सिलसिला यूँ ही?

ना तुम जानो हो ना हम
बस चले जा रहे हो तुम अपने जोश में 

और परछाईं जैसे  कदम रखे जा रहे है सँग हम

खुश तुम हो अपनी मर्जियों की पूर्ति पर 

और बेहद खुश है तुम्हारी खुशी में हम
और क्या चाहिये इस जिंदगी से 

कभी-कभी सवाल ये ना करने को करता है मेरा मन

जब तुम मिले चाहने को तो अब 

और कोई ख्वाईश क्यूँ करें इस जीवन से हम
बेशक तुम्हारी जिद्द हूँ मैं पर क्यूँ ना 

हर जन्म तुम पर वार दे ऐसी मुहहोवत करें तुमसे हम।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो

रह-रह के जिंदगी में वापस आते हो
मरहम लगाने आते हो या जख्म हरे कर जाते हो
रुकने के लिए नहीं....हो नहीं अब साथ मेरे ये बताने आते हो


ना जाने क्या तुम्हारे मन में समायी हैं 

क्या लेने बार-बार तुम चले आते हों

मुस्कुराने को कहते हो,रुलाने का मौका छोड़ते नहीं
बस तुम्हारा चलता हैं मुझ पर फिर भी खुश कभी तुम हमसे होते नहीं,

बेमुरब्बत,बेदर्दी,बेहया कुछ भी कहते तुमसे बनता नहीं
पता नहीं क्यूँ तुम इस जिस्म में बसे हों जो तुम्हें सुहाता नहीं 
और तुम कभी इसे अपनाते नहीं 

जाते मुझे पूरी तरह छोड़कर नहीं और होकर भी मेरे कभी होते नहीं,
सितमों के तुम बादशाह बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी रहमत बरसाने आते हो,
दर्द के तुम जहाँगीर बन बैठे हो जो मेरे लिये भण्डार भराते हो, 
बहते हुए मेरे खूनी आंसुओं के तुम सरकार बन बैठे हो जो मुझ पर अपनी सत्ता खड़ी कराते हो

कर्कशता तुम पर कभी मेरी शुरू होना सोचती नहीं,

मधुरता तुम पर कभी मेरी खत्म होना चाहती नहीं दोनों के बीच झूलती हूँ मैं जिसकी ढील तुम बढ़ाते हो और मेरी वफ़ा पर अपनी चालांकि हंसी का ठप्पा लगाते हो ....
मुझे नादान समझने की भूल तुम पहली दफा से आज भी दोहराते हो किसी पल में जाकर ये नहीं सोचते तुम मेरे प्यार के आगे खुद को कितना हारा हुआ पाते हो,
गुम हो अपनी ही धुन में तुम और अपनी ही चलाते हो 
मुझे ठुकरा कर दिल वाली पाने की इच्छा जताते हो....
रोती आखों से अब हँसी तुम पर आती है 
क्या खूब गजब हो तुम जिंदा को मुर्दा बनाकर 
जिंदगी जीयो का डंका बजाते हो।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being....✍

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

मेरे महबूब तेरी गलियां

मेरे महबूब तेरी गलियां मेरे लिए थी ही नहीं
बहुत ये चाहा मैंने पहुंच सकूँ तुझ तक 

पर तुझ तक पहुंचती राहें मुझे मंजूर करती थी ही नहीं

कैसे न बिखरने देती खुद को मैं जब सबकुछ तुम थे मेरे
पर मेरे नसीब से लड़ने को राजी तेरी चाहत थी ही नहीं


मेरे महबूब ये जो तेरी गलियां थी और ये जो तेरी चाहतों की मनमर्जियां थी

सिर्फ तुझ तक थी मुझ तक तो कभी ये भूल कर भी थी ही नहीं

Written By Ritika(Preeti) Samadhiya.....Please Try To Be A Good Human Being...✍

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

शब्द



Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

प्रीत चुनरियाँ


सुनो सँवरिया 
तेरी याद में हो गई बावरिया 
बहुत बिताई जुदाई सँग रतियाँ
दर्पण में खुद की परछाईं को तुम मानकर तन्हाई से की जी भर बतियाँ
अनजानी सी सूरत तुम्हारी,अनसुनी सी बोली तुम्हारी
 ना नाम ना पता तुम्हारा फिर भी 
प्रेम के कागज पर ह्रदय की कलम से लिखी तुम्हें ढेरों चिठ्ठियां
और तुम फिर भी बने रहे बहरूपिया 
अब टूटा है सब्र का हर बांध और छूटी है मुझसे मेरी नगरिया
तुम तो हो बड़े ही कठोर और सब्रीले पिया पर
 हमारा ना लागे है अब तुम बिन जियरा 
तुम सँग ही अब भोर और तुम सँग ही अब ये 
साँझ देखेगी मेरे नयनों की उजिरिया 
आ रही हूँ होके प्रेम से सराबोर और ओढ़ मैं प्रीत चुनरियाँ।

Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being...✍

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017



Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

शनिवार, 16 सितंबर 2017

#माँ


बहुत दुखद है माँ....
तेरी इच्छाओं का मर जाना
इमारत बनाने के लिए
खुद का नींव बन जाना
स्वयं अपने पंख नोंच के 
उन्हें बच्चों को पहनाना
बड़ी बड़ी जरूरतों को हमसे
छिपा के हंसी में छुपाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा आँसू पी जाना
लीपते आँगन में हाथ की 
लकीरो का मिट जाना
चूल्हे की आग में सपनों का
राख हो जाना
हर दर्द को नियति मान कर
तेरा उसे गले लगाना
और फिर मेरी मोहक
मुस्कान में अपनी सारी
तकलीफ़ भूल जाना
बहुत कठिन है माँ.....
तेरा माँ बन जाना
धुँए की ओट में 
तेरा अश्रुओं को छिपाना
प्यार के दो बोल के लिए
पूरा जीवन न्यौछावर कर जाना
घर को घर बनाने के बाद भी 
वो तेरा घर ना कहलाना
बचपन का आँगन छोड़
अनजाने आँगन में बस जाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा पल में जीवन बदल जाना
शिक्षित बच्चों के सामने
खुद का गँवार बन जाना
हर झिड़की पर भी होंठो से
भर भर आशीष देती जाना
आख़री साँस तक बच्चों पर
भरपूर ममता बरसाना
सबकी आँखो में अपने लिए
थोडा सम्मान तलाशना
बहुत दुखद है माँ......
तेरी ममता को ना पहचानना
सब कुछ खो कर भी 
कुछ ना हाथ में आना
सब कुछ दे कर भी
खाली हाथ चले जाना
बहुत दुखद है माँ........
तेरी इच्छाओं का मर जाना........

By: Geetanjali Girwal



Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस



Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

सोमवार, 11 सितंबर 2017

जिंदगी



जिंदगी रुला मत
चार दिन के मेहमान है हम
मामूली से इंसान 
तेरे कर्जदार है हम

पा लेने दे अब मंजिल 
इक और एहसान कर
इतना भी मत दौडा
कि चल भी ना पाए हम

मंजिल को इंतजार है
राह से मत भटकाना अब
राही भी बेकरार है
अब और खेल रचाना मत

आधी से ज्यादा जिंदगी
तेरे खेलो मे उलझो रहे हम
अब थोडी सी बची है
तू उसको ना बर्बाद कर

सांसो की डोर जो टूट गयी
फिर जिंदगी तू भी वीरान है
मत भूल तमाशा बनाने को
तुझे भी इन्सानो की तलाश है

 ~ Anupama

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

रविवार, 3 सितंबर 2017

किस्मत बेगुनाह है



महज ख्वाब ना देखा कर
बेशक आगे थोडा धीरे चल
उम्मीद दूसरो से रख कर
दीवानो वाला हाल ना कर
गर हारा भी है तू चलकर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर

मंजिल को जाती दिशा पकड
यहाँ कांटे है पांव संभल कर रख
फिर गिरे जब ठोकर खाकर
खूद ही अपना तू हौसला बन
गर संभल ना पाया तू गिर कर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर

कोरा कागज मानकर चल
क्या लिखना है फिर निश्चित कर
तुझे सपने दे कोई और आकर 
तू उससे पहले ही बुनकर रख
गर ना हुआ पूरा फिर कोशिश पर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर

 #Anupama_verma

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

"माँ" "

लेती नहीं दवाई "माँ",
जोड़े पाई-पाई "माँ"।

दुःख थे पर्वत, राई "माँ",
हारी नहीं लड़ाई "माँ"।


इस दुनियां में सब मैले हैं,
किस दुनियां से आई "माँ"।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे,
गरमागर्म रजाई "माँ" ।


जब भी कोई रिश्ता उधड़े,
करती है तुरपाई "माँ" ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस,
लेकिन बरक़त लाई "माँ"।


बाबूजी थे सख्त मगर ,
माखन और मलाई "माँ"।

बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई "माँ"।


नाम सभी हैं गुड़ से मीठे,
मां जी, मैया, माई, "माँ" ।

सभी साड़ियाँ छीज गई थीं,
मगर नहीं कह पाई  "माँ"


घर में चूल्हे मत बाँटो रे,
देती रही दुहाई "माँ"।

बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ-साथ मुरझाई "माँ" ।


रोती है लेकिन छुप-छुप कर,
बड़े सब्र की जाई "माँ"।

लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई "माँ" ।


बेटी रहे ससुराल में खुश,
सब ज़ेवर दे आई "माँ"।

"माँ" से घर, घर लगता है,
घर में घुली, समाई "माँ" ।


बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई "माँ" ।

दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई "माँ"।


घर के शगुन सभी "माँ" से,
है घर की शहनाई "माँ"।

सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई मां! 

Deepika

Hit Like If You Like The Post.....


Share On Google.....

ब्लॉग आर्काइव

Popular Posts