साहित्य सारथी..... सभी हिंदी लेखकों व पाठकों लिए एक ब्लॉग, जहां आप आनंद लेंगे लघु कथाओं और कविताओं का, इसके अलावा आप अपनी लघु कथाएँ व कवितायें भी प्रकाशित कर सकते हैं।
रविवार, 15 अक्टूबर 2017
प्रीत चुनरियाँ
सुनो सँवरिया
तेरी याद में हो गई बावरिया
बहुत बिताई जुदाई सँग रतियाँ
दर्पण में खुद की परछाईं को तुम मानकर तन्हाई से की जी भर बतियाँ
अनजानी सी सूरत तुम्हारी,अनसुनी सी बोली तुम्हारी
ना नाम ना पता तुम्हारा फिर भी
प्रेम के कागज पर ह्रदय की कलम से लिखी तुम्हें ढेरों चिठ्ठियां
और तुम फिर भी बने रहे बहरूपिया
अब टूटा है सब्र का हर बांध और छूटी है मुझसे मेरी नगरिया
तुम तो हो बड़े ही कठोर और सब्रीले पिया पर
हमारा ना लागे है अब तुम बिन जियरा
तुम सँग ही अब भोर और तुम सँग ही अब ये
साँझ देखेगी मेरे नयनों की उजिरिया
आ रही हूँ होके प्रेम से सराबोर और ओढ़ मैं प्रीत चुनरियाँ।
Written By Ritika{Preeti} Samadhiya... Please Try To Be A Good Human Being...✍
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शनिवार, 16 सितंबर 2017
#माँ
बहुत दुखद है माँ....
तेरी इच्छाओं का मर जाना
इमारत बनाने के लिए
खुद का नींव बन जाना
स्वयं अपने पंख नोंच के
उन्हें बच्चों को पहनाना
बड़ी बड़ी जरूरतों को हमसे
छिपा के हंसी में छुपाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा आँसू पी जाना
लीपते आँगन में हाथ की
लकीरो का मिट जाना
चूल्हे की आग में सपनों का
राख हो जाना
हर दर्द को नियति मान कर
तेरा उसे गले लगाना
और फिर मेरी मोहक
मुस्कान में अपनी सारी
तकलीफ़ भूल जाना
बहुत कठिन है माँ.....
तेरा माँ बन जाना
धुँए की ओट में
तेरा अश्रुओं को छिपाना
प्यार के दो बोल के लिए
पूरा जीवन न्यौछावर कर जाना
घर को घर बनाने के बाद भी
वो तेरा घर ना कहलाना
बचपन का आँगन छोड़
अनजाने आँगन में बस जाना
बहुत दुखद है माँ....
तेरा पल में जीवन बदल जाना
शिक्षित बच्चों के सामने
खुद का गँवार बन जाना
हर झिड़की पर भी होंठो से
भर भर आशीष देती जाना
आख़री साँस तक बच्चों पर
भरपूर ममता बरसाना
सबकी आँखो में अपने लिए
थोडा सम्मान तलाशना
बहुत दुखद है माँ......
तेरी ममता को ना पहचानना
सब कुछ खो कर भी
कुछ ना हाथ में आना
सब कुछ दे कर भी
खाली हाथ चले जाना
बहुत दुखद है माँ........
तेरी इच्छाओं का मर जाना........
By: Geetanjali Girwal
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गुरुवार, 14 सितंबर 2017
सोमवार, 11 सितंबर 2017
जिंदगी
जिंदगी रुला मत
चार दिन के मेहमान है हम
मामूली से इंसान
तेरे कर्जदार है हम
पा लेने दे अब मंजिल
इक और एहसान कर
इतना भी मत दौडा
कि चल भी ना पाए हम
मंजिल को इंतजार है
राह से मत भटकाना अब
राही भी बेकरार है
अब और खेल रचाना मत
आधी से ज्यादा जिंदगी
तेरे खेलो मे उलझो रहे हम
अब थोडी सी बची है
तू उसको ना बर्बाद कर
सांसो की डोर जो टूट गयी
फिर जिंदगी तू भी वीरान है
मत भूल तमाशा बनाने को
तुझे भी इन्सानो की तलाश है
~ Anupama
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रविवार, 3 सितंबर 2017
किस्मत बेगुनाह है
महज ख्वाब ना देखा कर
बेशक आगे थोडा धीरे चल
उम्मीद दूसरो से रख कर
दीवानो वाला हाल ना कर
गर हारा भी है तू चलकर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर
मंजिल को जाती दिशा पकड
यहाँ कांटे है पांव संभल कर रख
फिर गिरे जब ठोकर खाकर
खूद ही अपना तू हौसला बन
गर संभल ना पाया तू गिर कर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर
कोरा कागज मानकर चल
क्या लिखना है फिर निश्चित कर
तुझे सपने दे कोई और आकर
तू उससे पहले ही बुनकर रख
गर ना हुआ पूरा फिर कोशिश पर
कहाँ कमी रह गयी पता कर
यूँ पागलपन की हद मत कर
किस्मत बेगुनाह है शक मत कर
#Anupama_verma
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"माँ" "
लेती नहीं दवाई "माँ",
जोड़े पाई-पाई "माँ"।
दुःख थे पर्वत, राई "माँ",
हारी नहीं लड़ाई "माँ"।
इस दुनियां में सब मैले हैं,
किस दुनियां से आई "माँ"।
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे,
गरमागर्म रजाई "माँ" ।
जब भी कोई रिश्ता उधड़े,
करती है तुरपाई "माँ" ।
बाबू जी तनख़ा लाये बस,
लेकिन बरक़त लाई "माँ"।
बाबूजी थे सख्त मगर ,
माखन और मलाई "माँ"।
बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई "माँ"।
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे,
मां जी, मैया, माई, "माँ" ।
सभी साड़ियाँ छीज गई थीं,
मगर नहीं कह पाई "माँ" ।
घर में चूल्हे मत बाँटो रे,
देती रही दुहाई "माँ"।
बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ-साथ मुरझाई "माँ" ।
रोती है लेकिन छुप-छुप कर,
बड़े सब्र की जाई "माँ"।
लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई "माँ" ।
बेटी रहे ससुराल में खुश,
सब ज़ेवर दे आई "माँ"।
"माँ" से घर, घर लगता है,
घर में घुली, समाई "माँ" ।
बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई "माँ" ।
दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई "माँ"।
घर के शगुन सभी "माँ" से,
है घर की शहनाई "माँ"।
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई मां!
Deepika
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गुरुवार, 31 अगस्त 2017
अचार
वो रास्ता रोके ज़िद पे अड़ी थी,
मैं सामने दरवाजे पे खड़ा था
हाथ पकड़ कर बोली
चलो,,,,, चले आज वहाँ
जहाँ जाया करते थे अक्सर हमतुम,
और खो जाते थे कई कई पहर
एकदूसरे को निहारते हुए हम,
भूल जाते थे इस संसार को
उतार फेकते थे सारा तनाव
जो ऑफिस से घर ले कर आते थे
चलो आज फिर चले, कई दिनों बाद,
ख़त्म हो गया है ख़ुशी का वो राशन-पानी
जो सदा रहता था मेरे पास
बहुत दिनों से तुम को हँसते नहीं देखा,
नहीं देखा बच्चों के साथ बच्चा बनते हुए
और ना ही देखा है मुझे प्यार करते हुए
आओ ना.... फिर चले उस पर्वत के पार
भर लाऊंगी दामन में ढेर सारी खुशियां,
धूप का टुकड़ा औ चाँद सी शीतलता सा प्यार
कुछ ख़ामोशी, कुछ खिलखिलाहटें
औ ढेर सारा एतबार.......
इन सब का डाल कर अचार
रख लुंगी अपने पास.....
और परोस दिया करुँगी तब,
जब तुम दिखोंगे थोड़ा उदास,
जीवन की आपाधापी में,
मेरा ये चटपटा अचार
हम में भर देंगा खुशियों का संसार
आओ चले हम तुम
उस पर्वत के पार.........
#Geetanjali
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बुधवार, 30 अगस्त 2017
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
लोगों से मैंने खुद की तारीफ को इस तरह सुना है
कि
दिल मेरा शीशे सा साफ है
कोई ऐब नहीं,कोई ऐंठ नहीं
मन पर खुदा के नाम की चादर पाक है
शायद इसलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।
आँखें मेरी चंचला की दास है
कोई आखेटकी भाव नहीं, क्रुध्ता का स्वभाव नहीं
अश्रुओं पर सँतोषी पिपासा की आस है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।
होंठ मेरे गुलाब की छांव है
कोई कड़वाहट नहीं,कोई अपशब्द नहीं
वाणी पर सरस्वती का वास है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।
तन मेरा सलिल का आवास है
कोई मैल नहीं,कोई खिलकोटी खेल नहीं
आत्मा पर सर्वसूरती प्रेम के रंगों का आकाश है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है
शायद इसीलिये अब तक मेरा खाली हाँथ है।
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मंगलवार, 29 अगस्त 2017
शायरी
कुछ यूँ अलग ना हुए हो तुम मुझसे कि
इस तिमिर में भी मुझे तेरा चहेरा साफ दिखाई देता है
तू प्रत्यक्ष नहीं साथ मेरे पर तेरा अश्क मझमें परछाईं लिये हुए बैठा है।
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रविवार, 27 अगस्त 2017
बादल
बूंद : आँसू , बादल : दिल ,धरती : जीवन , आसमान : दुनिया , सितारे : लोग
बादलों को समेट , एक बूँद धरती पर आ गिरी,
बादलों को समेट , एक बूँद धरती पर आ गिरी,
बिखेर दी खुश्बू धरती ने , और आसमान से जा मिली
हवा चहकी, धरती महकी, बादल की सुर सुरीली
पर आसमान की काली हस्ती, पहचान खुद की ना मिली
फिर समेट बूँद को सीने मे, बादल ने गर्जना छोड़ दिया
धरती कैसी, अंबर कैसा, बादल ने जलना छोड़ दिया
दबा दर्द को सीने मे, बादल ने टहलना छोड़ दिया
हवा ठहरी, धरती सहमी, समय ने रास्ता मोड़ दिया
देख दशा ये धरती की, बादल ने फिर शोर किया
बह गया हर बूँद मे, बस, दर्द सीने मे छोड़ दिया
खोकर खुद को, सीना धरा का सींच दिया
आसमान की काली हस्ती, देख बादल ने मौन किया
दर्द दबा था सीने मे, बादल ने कुछ गौर किया
हवा बहके, धरती महके, फिर क्यूँ आसमान मे शोर किया
लाखों सितारे हैं आसमान मे, क्यूँ हर एक पर गौर किया
हो खुश्बू मेरे आँगन की, क्यूँ धरा पर ज़ुल्म-ज़ोर किया
आसमान की काली हस्ती, देख बदल ने, दर्द सिने का डोल दिया
सुभाष वर्मा
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शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
अधूरी कहानी
ना बेवफाई हमने की, ना वफा जैसी कोई बात थी
वो मिले ही कुछ ऐसे, कि हमसे हाँ ही ना हो सकी
मोहब्बत तो हमे भी थी, फिर भी ना कह गयी
यही एक मेरी बात,उसे सबसे ज्यादा खल गयी
लाख कोशिशे उसने की, पर मै भी मजबूर थी
अपने क्या उसके भी, आँसू का कारण बन गयी
मेरी ना की वो जिद, उसको बहुत चुभने लगी
मुझसे मेरी पहली मोहब्बत, नफरत करने लगी
वो जो मेरे लिए गालिब, बन जाता था कभी
आज उसी ने तानो की किताब, मेरे नाम लिख दी
उसकी तरह, उसके ही लिए, मै भी जग से लडने को आतुर थी
पर सब खत्म तब हुआ, जब अपनो से लडने की हिम्मत ना कर सकी
अब मिलते तो हम नही, पर मोहब्बत आज भी है वही
घडी की सुई की तरह, दिल मे धड़क रही
ना बेवफाई हमने की, ना वफा जैसी कोई बात थी
वो मिले ही कुछ ऐसे, कि हमसे हाँ ही ना हो सकी
#Anupama_verma
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